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सर झुकाये हयात आई इसरार पर- शिज्जु शकूर

212 212 212 212
आये उश्शाक़ खुद को लिये दार पर
सर झुकाये हयात आई इसरार पर

ओस की बूंद सा चाँद ढलता हुआ
खूब है सुब्ह के सुर्ख़ रुखसार पर

माह अफ़्लाक़ पर जल उठे हैं कई
नूर उछला है उनका शबे तार पर

मारने हक़ हज़ारों खड़े हैं यहाँ
और मक़्तूल तलवार की धार पर

अपनी नाकामियों का ख़मोशी के साथ
रख दिया उसने इल्ज़ाम अगयार पर

कौन अपना नुमाइंदा है मुल्क में
फूल है तो कहीं हाथ दस्तार पर

ढूँढ ही लेते हैं राह अहले जिगर
खत्म मौके नहीं होते इक हार पर

(उश्शाक़- आशिक़ का बहुवचन; इसरार- आग्रह, हठ; रुखसार- गाल;
अफ़्लाक़- फ़लक़ का बहुवचन; मह- चाँद; शबे तार- अँधेरी रात;
मक़्तूल- मरनेवाला; अगयार- दुश्मन; दस्तार- पगड़ी)

-मौलिक,अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 12, 2015 at 8:28pm
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय बेगोवाल सर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 12, 2015 at 8:27pm
बहुत बहुत शुक्रिया मंसूरी साहब
Comment by मोहन बेगोवाल on November 4, 2015 at 11:15pm

 आदरणीय शिज्जू जी, बाकमाल ग़ज़ल

ये शे'र  बहुत ही सुंदर लगा

अपनी नाकामियों का ख़मोशी के साथ
रख दिया उसने इल्ज़ाम अगयार पर  -बधाई हो 

Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 8:37pm

उम्दा ,ग़ज़ल, वधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 4, 2015 at 6:11pm
आदरणीया कांता रॉयजी आपका तहेदिल से शुक्रिया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 4, 2015 at 6:10pm
आदरणीय लक्ष्मणजी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 4, 2015 at 6:10pm
आदरणीय मुकेश श्रीवास्तव सर आपका हार्दिक आभार

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Comment by शिज्जु "शकूर" on November 4, 2015 at 6:09pm
आदरणीया राजेश दीदीद आपका बहुत बहुत शुक्रिया

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Comment by शिज्जु "शकूर" on November 4, 2015 at 6:08pm
आदरणीय पंकजजी आपका बहुत बहुत शुक्रिया

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Comment by शिज्जु "शकूर" on November 4, 2015 at 6:07pm
आदरणीय गिरिराजजी आपका हार्दिक आभार

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