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गजल
2122 2122 2122 2122
हम हुए कब से पराये अब बताना चाहिए भी,
जब हुए थे मनचले हम यह सुनाना चाहिए भी।
चुभ गयी थी चाँदनी तब ओस की इक बूँद बनकर,
हृत्-पटल तब से विखंडित कुछ जुड़ाना चाहिए भी।
खो गये हम थे बहुत उस नेह की सूनी डगर तब,
हैं कहाँ पहुँचे पता अब तो लगाना चाहिए भी।
भूलते हम जा रहे, जाना बहुत,फिर भी कहाँ तक,
रुत नयी नित हो रही कुछ तो अ-जाना चाहिए भी
बादलों-से केश काले कर रहे अठखेलियां जब,
ढक न जाये चाँद अब घूँघट हटाना चाहिए भी।
झील-सी आँखें बड़ी भोली हुआ करतीं कहूँ मैं,
दृष्टि की निर्बाध-सी लहरें उठाना चाहिए भी।
साँस का अहसास कबसे हो रहा है मानिनी सुन,
धड़कनों में मनचली साँसें सजाना चाहिए भी।
है चमन सूखा पड़ा फिर चल रही सूखी हवा अब
बन हवा भींगी हुई कुछ तो लुभाना चाहिए भी।
मन भटक व्याकुल हुआ अब ढूँढता क्या आजमाये,
मन-भँवर में आपके होना ठिकाना चाहिए भी।
हो गयी कुछ बात है जाने भला कैसे कहूँ मैं,
जो हुआ अब तो भला उसको निभाना चाहिए भी।
बात तब की छोड़िये पलकों में'थे पल पल बिताये,
हो घड़ी भर अब घड़ी पलकें बिछाना चाहिए भी।
"मौलिक व अप्रकाशित"@

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Comment by Samar kabeer on November 10, 2015 at 10:33pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी,आदाब,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 10, 2015 at 1:55pm

आदरणीय मनन जी इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

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