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त़रह़ी ग़ज़ल /हवाऐं लौ को. .

त़रह़ी ग़ज़ल /हवाऐं लौ को...
1222×4

हवाऐं लौ को आहिस्ता हिलाती हैं दिवाली में
डुलाती हैं ये सहलाती बुझाती हैं दिवाली में.

मचलती हैं चमकती हैं कभी कोई बहकती है
ये लड़ियाँ रौशनी की खिलखिलाती हैं दिवाली में.

बदल कर पैरहन अपने हुए जुलुमात हैं रौशन
'फ़िज़़ाऐं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में'.

जली थीं जो भी क़ंदीलें पसे दीवार छुप छुप कर
नुमायाँ कर के ख़ुद को अब जलाती हैं दिवाली में.

खुशी से झूमते ये नूर यां भी हैं वहाँ भी हैं
ये लौएं तालियाँ देखो बजाती हैं दिवाली में.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on November 13, 2015 at 1:50pm

आदरणीय सुनील जी....बहुत बढ़िया . बधाई |

Comment by shree suneel on November 13, 2015 at 10:32am
ग़ज़ल में शिर्कत के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ पांडे सर जी. सादर
Comment by shree suneel on November 13, 2015 at 10:28am
ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय मिथलेश वामनकर सर जी. सादर.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 13, 2015 at 12:19am

इस प्रस्तुति केलिए हृदय से बधाई, आदरणीय श्री सुनीलजी. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 12, 2015 at 11:32pm

आदरणीय सुनील जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद कुबूल फरमाएं 

कृपया ध्यान दे...

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