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ग़ज़ल -बच गये तो शेर, वर्ना कागज़ी थे, सोचिये - ( गिरिराज भंडारी )

2122 2122 2122 212
छोड़िये पानी में उनको तज़्रिबा तो कीजिये
बच गये तो शेर, वर्ना कागज़ी थे, सोचिये

दोस्त हैं हम आपके, इतना तो हक़ होगा हमें
दर्द अपना, आपको दे, कह सकें, सह लीजिये

हम भरोसा किस तरह कर लें, बतायें हाल पर
जब्र से इतिहास उनका है भरा, पढ़ लीजिये

जिनकी है बारूद चाहत वो ज़मीं को देंगे क्या ?
खूँ बहुत है मुल्क़ में तो आप वो ही सींचिये

आपको इनकार यूँ , शोभा नहीं देता ज़नाब
ज़ह्र तो पीते रहें हैं , और थोड़ा पीजिये

आपको ये घर मेरा चुभने लगा है, दोस्त फिर
शह्र है काफी बड़ा , चाहे जहाँ रह लीजिये

आपके दिल के बहुत नजदीक हैं, ये क़त्ले आम
आप, अपने मुल्क़ में मातम जरा अब देखिये
*********************************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2015 at 7:35am

आदरनीय महर्षि भाई ,गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2015 at 7:34am

प्रिअय अनुज जान जोरखपुरी , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2015 at 7:34am

आदरणीय रवि भाई , हौसला अफज़ाई के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2015 at 7:32am

आदरणीया राहिला जी , गज़ल की प्रशंसा कर उत्साह वर्धन करने के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by maharshi tripathi on November 19, 2015 at 4:56pm

इस् खुबसूरत गजल पर दाद कुबुलें आ. सर |

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on November 19, 2015 at 2:28pm
बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल हुयी है आ. गिरिराज सर बधाई।
Comment by Ravi Shukla on November 19, 2015 at 1:57pm

आदरणीय गिरिराज जी बहुत ही सुन्‍दर गैर मुरद्दफ ग़ज़ल कही है आपने हर शेर पर बधाई कुबूल करें


दोस्त हैं हम आपके, इतना तो हक़ होगा हमें
दर्द अपना, आपको दे, कह सकें, सह लीजिये ये शेर हमें बहुत पसंद आया । दिली मुबारक बाद कुबूल करें । सादर

Comment by Rahila on November 19, 2015 at 11:50am
बहुत बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय गिरिराज सर जी! एक -एक शेर बहुत शानदार लगा । बहुत बधाई । सादर प्रणाम ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 19, 2015 at 11:10am

आपको इनकार यूँ , शोभा नहीं देता ज़नाब --

आदरणीय पाठकों से प्रार्थना है कि , इस मिसरे मे आया शब्द -- शोभा स्त्री लिंग शब्द होने के कारण  उसे   

 इस तरह पढ़ने की कृपा करें  --  
आपको इनकार यूँ , शोभा नहीं देती ज़नाब  
                                                           सादर

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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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