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एक दोराहे पे खड़ा है दिल मेरा ,
एक अजीब सी कश्मकश
चलती रहती है मेरे अंदर
दोस्ती और मोहब्बत की रस्सी से बने पुल पर |
 
उसकी ख़ुशी में जो मुस्कुराना चाहूँ
तो मोहब्बत रोकती है ,
रोना चाहूँ जो खुद की बेबसी पर
तो दोस्ती मना करती है ,
चाहे कोई भी जीते इन दोनों में ,
हर हाल में ,
हर बार ,
हार तो मेरी ही निश्चित है |

Views: 492

Comment

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Comment by Veerendra Jain on April 23, 2011 at 11:37am
Bahut bahut aabhar... Vandanaji...
Comment by Veerendra Jain on April 23, 2011 at 11:37am
Ji bilkul ..Saurabh sir... yuva varg kabhi bhram aur kabhi lachaari ke fer me hi pad kar lakshya se bhatak jata hai aajkal... bahut bahut aabhar aapka...
Comment by Veerendra Jain on April 23, 2011 at 11:35am
Dhanyawad ..Ashish ji..

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 22, 2011 at 5:00pm
"किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ.." के इस पेशोपेश में भ्रम नहीं लाचारी उभर कर आती है. वयस विशेष की दुविधा प्रस्तुत रचना में निखर कर आयी है. बधाई.
Comment by आशीष यादव on April 22, 2011 at 2:24pm
एक दोराहे पे खड़ा है दिल मेरा ,
एक अजीब सी कश्मकश
चलती रहती है मेरे अंदर
दोस्ती और मोहब्बत की रस्सी से बने पुल पर |

bahut sundar bhawabhiwyakti,

Comment by Veerendra Jain on April 22, 2011 at 12:21pm
Neelam didi , Amitesh ji , Ganesh ji.... bahut bahut aabhar...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 21, 2011 at 9:02pm
अच्छी अभिव्यक्ति |
Comment by अमि तेष on April 21, 2011 at 1:55pm
bahut khub..
Comment by Neelam Upadhyaya on April 21, 2011 at 9:53am
Bahut hi khoobsoorat panktiya hai.  Badhayee.

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