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दबे कुचले हुए लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है? -- इमरान खान

हुकूमत तुम ग़रीबों के सरों पर हाथ रक्खेगी,

दबे कुचले हुए लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है?

सियासत अपने मंसूबों में तुमको साथ रक्खेगी,

मसाइल से घिरे लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है?

तुम्हारी आंख से निकले हुए आंसू को वो देखें?

तुम्हारी सिसकियाँ देखें या फॉरेन टूर को देखें?

तुम्हारी फस्ल ना आने के मातम को मनायेगें,

या जाकर वेस्ट कंट्री से वो एफडीआई लायेंगे?

मिटाना चाहते हैं वो दुकानों को बाज़ारों से,

कोई मतलब नहीं उनको ग़रीबों से लाचारों से.

कभी वो ‘बीटी कॉटन’ और कभी वो ‘गेट’ लाते हैं,

तुम्हें ही ढेर करने के वो मनसूबे बनाते हैं.

फलों से सब्जियों से अपने मल्टी स्टोर भर लेना,

वो चाहते हैं तुम्हारी खेतियां मकबूज़ा कर लेना.

तुम्हारे जंगल उनकी आंख में काँटा सा चुभते हैं,

इन्हें कटवा के वो अपनी सिटी स्मार्ट चाहते हैं.

उन्हें बस मॉल बिल्डिंग और मल्टीप्लेक्स प्यारे हैं,

तुम्हारे झोंपड़े उनकी प्लानिंग को बिगाड़े हैं.

तुम्हें पगलो पता भी है ज़माने की परेशानी,

समिट मैं बैठकर चर्चा हुई मौसम बदलने की.

हुई मौसम में तब्दीली जो वो तुमने कराई है,

वो कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग तुमने बढाई है.

ग़रीबो! तुम घरों के चूल्हों से धुआं उड़ाते हो,

किसानो! तुम पे भी इलज़ाम है पूले जलाते हो.

और उन इलज़ाम देने वालों के हमी हैं जो उन पर,

अरे हद से भले लोगो! तुम्हें अब तक भरोसा है?

(मौलिक और अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 17, 2015 at 12:58am

शासन और सत्ता किस तरीके आमजन की सोच और आकांक्षाओं से दूर है यह किसी एक देश की बात नहीं है. आपकी इस नज़्म में इसी भाव को खूबसूरती से शब्दों में पिराया गया है. आपकी जागरुकता को साझा करते इस नज़्म के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएँ और हार्दिक बधाइयाँ, इमरान भाई. 

Comment by इमरान खान on December 6, 2015 at 1:08am

गिरिराज जी गज़ल आपको पसंद आई मेरे लिए खुशी का मुकाम है, बेहद शुक्रिया।

Comment by इमरान खान on December 6, 2015 at 1:07am

कांता जी आपकी हौसला अफज़ाई का दिल से शुक्रिया

Comment by इमरान खान on December 6, 2015 at 1:06am

पसंद करने के लिए शुक्रिया दिग्‍विजय साहब

नज्‍़म उर्दू में कविता को कहते हैं। इसमें मतले, मकते वगैरह की पाबंदी नहीं होती। अक्‍सर एक ही ख्‍याल का गहराई से नज्‍म में शायर बयान करता है। गजल की तरह नज्‍म में हर शेर का आजाद तरीके से मुकम्‍मल होना जरूरी नहीं होता और एक शेर के बाद दूसरे शेर से भी मफहूम जुड़ा हो सकता है।  

Comment by इमरान खान on December 6, 2015 at 12:58am

इज्‍़ज़त अफज़ाई के लिए शुक्रिया लक्ष्‍मण धामी साहब। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 5, 2015 at 7:58pm

आदरणीय इमरान भाई , इस मार्मिक नज़्म के लिये आपको दिली बधाइयाँ ।

Comment by kanta roy on December 4, 2015 at 8:32pm

तुम्हारे जंगल उनकी आंख में काँटा सा चुभते हैं,
इन्हें कटवा के वो अपनी सिटी स्मार्ट चाहते हैं.------ क्या बात है ! क्या बात है ! हर अशआर को पढ़ने पर जुबान पर बस एक ही बात है , वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह !!!!!!!
बधाई आदरणीय इमरान खान जी।

Comment by DIGVIJAY on December 4, 2015 at 2:49pm

सर अगर नज्म कि शिल्प के बारे में थोड़ी जानकारी साझा करें तो मजा आ जाए । वैसे आपकी नज्म दिल को छू गयी, जनाब । सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 4, 2015 at 11:46am

आ० इमरान भाई इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by इमरान खान on December 3, 2015 at 11:55pm
बहुत बहुत शुक्रिया समर कबीर साहब.

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