आज किस तरह ज़िन्दगी खोई,
पास क्या दूर भी नहीं कोई.
एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,
रूह जिसको लिपट-लिपट रोई.
रात भर बेकली रही मुझ पर,
और दुनिया सुकून से सोई.
फूल आंगन में अब न तुम ढूंढो,
फस्ल काँटों भरी अगर बोई.
वक़्त अपना कुछ इस तरह बीता,
हमनशीं हो गई गज़लगोई.
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Comment
आदरणीय इमरान जी अच्छी ग़ज़ल के लिये दाद कुबूल करें
आदरणीय इमरान भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , सभी अश आर बहुत सुन्दर हुये हैं , हार्दिक बधाइयाँ आपको ।
आदरणीय इमरान जी शानदार ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद हाज़िर है-
आज किस तरह ज़िन्दगी खोई,
पास क्या दूर भी नहीं कोई...............बढ़िया मतला हुआ है
एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,
रूह जिसको लिपट-लिपट रोई......... वाह वाह ...शानदार शेर
रात भर बेकली रही मुझ पर,
और दुनिया सुकून से सोई....... बेहतरीन शेर..... दाद ही दाद
फूल आंगन में अब न तुम ढूंढो,
फसल काँटों भरी अगर बोई...........वाह वाह
वक़्त अपना कुछ इस तरह बीता,
हमनशीं हो गई गज़लगोई.............. बहुत सुन्दर
इस शानदार प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई
एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,
रूह जिसको लिपट-लिपट रोई..................वाह वाह!
बहुत सुन्दर गज़ल बधाई आदरणीय!
खूब सुन्दर
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