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पास क्या दूर भी नहीं कोई (इमरान खान)

आज किस तरह ज़िन्दगी खोई,

पास क्या दूर भी नहीं कोई.

एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,

रूह जिसको लिपट-लिपट रोई.

रात भर बेकली रही मुझ पर,

और दुनिया सुकून से सोई.

फूल आंगन में अब न तुम ढूंढो,

फस्ल काँटों भरी अगर बोई.

वक़्त अपना कुछ इस तरह बीता,

हमनशीं हो गई गज़लगोई.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Ravi Shukla on August 10, 2015 at 1:34pm

आदरणीय इमरान जी अच्‍छी ग़ज़ल के लिये दाद कुबूल करें


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 9, 2015 at 1:20pm

आदरणीय इमरान भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , सभी अश आर बहुत सुन्दर हुये हैं , हार्दिक बधाइयाँ आपको ।

Comment by Samar kabeer on August 8, 2015 at 11:26pm
जनाब इमरान ख़ान साहिब ,आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ,मुबारकबाद क़ुबूल करें,दूसरे शैर के ऊला मिसरे में 'चस्पा' को "चस्पाँ" कर लें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 6, 2015 at 9:43pm

आदरणीय इमरान जी शानदार ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद हाज़िर है-

आज किस तरह ज़िन्दगी खोई,

पास क्या दूर भी नहीं कोई...............बढ़िया मतला हुआ है 

एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,

रूह जिसको लिपट-लिपट रोई......... वाह वाह ...शानदार शेर 

रात भर बेकली रही मुझ पर,

और दुनिया सुकून से सोई....... बेहतरीन शेर..... दाद ही दाद 

फूल आंगन में अब न तुम ढूंढो,

फसल काँटों भरी अगर बोई...........वाह वाह 

वक़्त अपना कुछ इस तरह बीता,

हमनशीं हो गई गज़लगोई.............. बहुत सुन्दर 

इस शानदार प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by Harash Mahajan on August 6, 2015 at 7:35pm

आ० इमरान खान  जी

आज किस तरह ज़िन्दगी खोई,

पास क्या दूर भी नहीं कोई.....वाह बेहद उम्दा !!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on August 6, 2015 at 7:24pm

एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,

रूह जिसको लिपट-लिपट रोई..................वाह वाह!

बहुत सुन्दर गज़ल बधाई आदरणीय!

Comment by narendrasinh chauhan on August 6, 2015 at 6:17pm

खूब सुन्दर 

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