विद्यालय में मध्यान्ह भोजन की दाल में असंख्य इल्ली, तिलूले ,देखकर मैं आपे से बाहर हो गई । तुरंत बच्चों की पंगत उठा कर मैं मध्यान्ह भोजन के ठेकेदार से जम कर उलझ पड़ी । लेकिन वो भी कम ना था, हर बात को "इत्तेफाक "कह के टालने लगा । मुझे दुःख इस बात से ज्यादा हो रहा था कि पता नही कितने दिनों से ये मासूम ऐसा खाना खा रहे है । इत्तेफाक तो मेरे साथ हुआ कि मैं आज प्रभार में थी और ये कृत मेरी जानकारी में आ गया । मैंने तुरंत लिखित कार्रवाई शुरू की । अपने खिलाफ कार्रवाई होते देख उसने गिरगिट की तरह रंग बदला अब वो ढिठाई छोड़, घिघयाने लगा लेकिन अकड़ कायम थी । जब उसे हर बात बेअसर होती दिखी तो वो साम,दाम दंड, भेद पर आ गया ।
"अरे बहिन जी! गलती हो गई । चाहे तो सौ जूते मार लो, जो कहो करने बाको तैयार हूं "लेकिन मैं किसी भी कीमत पर मामला रफा -दफा करने के विचार में नहीं थी।इसलिये उसकी कोई भी बात का असर मुझ पर नहीं हो रहा था । परन्तु इस हंगामें से गांव के कुछ दंबंग और उसके सजातीय लोग जुड़ गये।और मुझ पर दबाव बनाने लगे आखिर ...
"तो ठीक है..,जब आप सभी की यही मर्जी है तो ये सही । लेकिन मामला रफा-दफा करना अब पूरी तरह से ठेकेदार साहब के हाथ में है । "कह, मेरे चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान फैल गई, जिसे देख मौजूद महानुभाव की अनुभवी आंखे चमक गईं।
"अरे कैसी बात कर दी आपने,आप तो हुकुम करो बस..."वो हाथ जोड़ ,खींसे निपोरता बोला ।
"तो ठेकेदार साहब !एक काम करें,बस एक कटोरा ये दाल पी लें।"
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मौलिक एवं अप्रत्याशित
Comment
बढ़िया लघुकथा है राहिला जी, बधाई स्वीकार करेंI वैसे, यदि यह लघुकथा मैं लिखता तो उस ठेकेदार को कहता कि पहले यह खाना तुम्हारे बच्चे खायेंगेI
बहुत अच्छी पंच-लाईन दी है। अच्छी लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीया राहिला जी।
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