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"ब्याह के बीस साल पाच्छे(बाद) हुआ तो वो भी एक छौरी...... . ."
ऐसा कहते हुए हस्पताल में मिलने आई जेठानी ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और वह अचंभित सी उसकी ओर देख रही थी।
"बालक सा हो ज्याता तो..." थोड़ी देर बाद फिर फूटी जेठानी।
"के बोल री हो बहनजी?अर आप रो क्यों रही हो इस मौके पै?"
"भगवान नै इतने साल मैं कोख खोली पर बालक कोणी दिया।बालक सा हो जाता तो घर न वारिस मिल जाता।"
"इब बस करो बहन जी।जब की टसुवे (आँसू) बहा री हो।हमने तो शुकर मनाना चाहिए भगवान का।के वारिस-वारिस की रट ला रखी है? बालक-सा का के मतलब? इब बताओ छौरी के बालक ना होत्ती?"

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 12, 2015 at 12:31pm
रचना के अवलोकन एवम् समीक्षा के बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय शेख साहब।अंतिम पंक्ति पर आपका सुझाव भी कदाचित उचित ही है।मेरा उद्देश्य लड़की को भी बालक(लड़के) के समान ही तव्वजो देने का था।वारिस के तौर पर लड़का और लड़की दोनों समान ही होने चाहियें।दोनों ही समान रूप से उत्तराधिकार रखते हैं।उनमें कोई फ़र्क न रखा जाए।बस इतना ही कहने का प्रयास किया था।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 12, 2015 at 12:10pm
स्वाभाविक बोली में कथोपकथन के साथ सुंदर संदेश वाहक कृति के लिए बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय सतविंदर कुमार जी।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 12, 2015 at 12:09pm
अंतिम पंक्ति थोड़ी और स्पष्ट कर देते,तो बढ़िया होता। जैसे कि--
-// इब बताओ छौरी के बालक से बढ़कर ना होत्ती?"//

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