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दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको

२१२  २१२  २१२  २१२ 

दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको 

तय ही है प्यार करना नहीं आपको 

चाँद अम्बर पे भी चाँद छत पे भी है 

कुछ भी हो है बहकना नहीं आपको 

रात दिन हुस्न क्यूँ यूं संवरता फिरे 

आँखों से कुछ समझना नहीं आपको 

बात गुल बुलबुलों तोता मैना कि क्या 

है कभी जब चहकना नहीं आपको 

सूखती जूड़े में नित नयी गुल कली 

खूब समझे बदलना नहीं आपको 

कितना भी यूं घटाओं सा उमड़ो मगर 

अब्र जैसे बरसना नहीं आपको 

आँखें दहकें भले जिस्म चाहे जले 

मोम सा पर पिघलना नहीं आपको 

छोड़ कर जा रहा हूँ जहाँ , पर पता 

ख्वाब में भी बिखरना नहीं आपको 

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 30, 2015 at 9:09pm

भाई गुमनाम जी ..मेरी रचना आपको पसंद आयी मेरा लिखना सार्थक हुआ ..बस आप सब का स्नेह यूं ही मिलता रहे ..सादर धन्यवाद और नव बर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 30, 2015 at 9:07pm

आदरणीय श्याम जी ..आपकी प्रतिक्रिया से उत्साहित हूँ ..सादर आभार और नव बर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 30, 2015 at 9:06pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई जी ..रचना पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ ..सादर धन्यवाद और नव बर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ सादर 

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 30, 2015 at 7:35pm

बहुत खूब है भाई जी वाह खूब ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by Shyam Narain Verma on December 30, 2015 at 1:09pm
बहुत सुन्दर ग़ज़ल! आपको हार्दिक बधाई!
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2015 at 11:37am

रात दिन हुस्न क्यूँ यूं संवरता फिरे 

आँखों से कुछ समझना नहीं आपको

बहुत खूब ....आ० आशुतोष भाई जी हार्दिक बधाई l

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 30, 2015 at 11:02am

आदरणीय सुनील जी रचना पर आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभारी हूँ सादर 

Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on December 29, 2015 at 8:09pm
बहुत खूब आदरणीय ।

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