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बीज नए पुष्पों के बोए साल नया (ग़ज़ल)

22 22 22 22 22 2

सबके मन की गांठें खोले साल नया
बिखरे रिश्तों को फिर जोड़े साल नया

भूखे को दे रोटी, निर्धन को धन दे
सबकी खाली झोली भर दे साल नया

ग़म से आहत दिल डूबा है आशा में
शायद थोड़ी खुशियाँ लाए साल नया

नभ में कदम बढ़ाता वो सूरज ही है
निकल पड़ा है या मुस्काए साल नया

मधु-हाला निःशुल्क मिलेगा मालिक से
कहता 'हरिया' जल्दी आए साल नया

जीवन का हर क्षण हो जाए सुरभित "जय"
बीज नए पुष्पों के बोए साल नया
====================

जयनित कुमार मेहता
(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 549

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Comment by ajay sharma on January 4, 2016 at 10:29pm

मधु-हाला निःशुल्क मिलेगा मालिक से
कहता 'हरिया' जल्दी आए साल नया............bahut salike se prastut vyanga ke liye  wah wah wah

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 4, 2016 at 7:28pm

सबके हक़ में दुआ अच्छा है .........................

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 3, 2016 at 6:57pm
वााााह-
//सबके मन की गांठें खोले साल नया
बिखरे रिश्तों को फिर जोड़े साल नया
//-- तमाम उम्मीदों को समेटे ख़ूबसूरत ग़ज़ल की पेशकश के लिए तहे दिल बहुत बहुत मुबारकबाद आदरणीय जयनित कुमार मेहता जी ।
Comment by जयनित कुमार मेहता on January 2, 2016 at 8:45pm
आदरणीय समर कबीर साहब, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका हौसला-आफजाई के लिए।।
Comment by Samar kabeer on January 2, 2016 at 2:41pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें |

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