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दुष्यंत कुमार को समर्पित मेरी एक ग़ज़ल

आपकी तालीम का हर अर्थ कुछ दोहरा तो है

आकाश पर बादल नहीं पर हर तरफ कोहरा तो है

 

बादशाहों की हमेशा ज़िन्दगी महफूज़ है

लड़ने-मरने के लिए शतरंज में मोहरा तो है

 

इस महल में अब खज़ाना तो नहीं बाकी रहा

द्वार पर दरबान है, संगीन का पहरा तो है

 

शोर करना हर नदी की चाहे हो आदत सही

ये समंदर हर नदी से आज भी गहरा तो है

 

तुम क़सीदे खूब पढ़ लो पर यहाँ हर आदमी

हो न गूंगा आज लेकिन, आज भी बहरा तो है

 

तुमने कांटे साफ़ कर आसां किया चाहे सफ़र

दूर तक है धूप अब भी, दूर तक सहरा तो है

 

"मौलिक व अप्रकाशित"

- डॉ. राकेश जोशी

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Comment by Dr. Rakesh Joshi on January 8, 2016 at 10:10pm

आदरणीय  Ravi Shukla जी,

सादर नमस्कार.

मेरी ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद.

मैं आपका आभारी हूँ.

सादर,

डॉ. राकेश जोशी

Comment by Dr. Rakesh Joshi on January 8, 2016 at 10:01pm
आदरणीय LOON KARAN CHHAJER जी,
सादर नमस्कार.
मेरी ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद.
मैं आपका आभारी हूँ.
सादर,
डॉ. राकेश जोशी
Comment by LOON KARAN CHHAJER on January 8, 2016 at 5:53pm

तुम क़सीदे खूब पढ़ लो पर यहाँ हर आदमी

हो न गूंगा आज लेकिन, आज भी बहरा तो है

बहुत शानदार गजल। लगता है दुष्यंत जी का बहुत असर है। 

Comment by Ravi Shukla on January 8, 2016 at 5:20pm

आदरणीय डॉ राकेश जी  ग़ज़ल के लिये आपको बहुत बहुत बधाई । आपकी गजल के हवाले से आदरणीय समर साहब से काफी जानकारी मिली उनका भी बहुत बहुत आभार यही वो उपलब्धि है जो यहां सीखने और सिखाने के सूत्र वाक्‍य से हम  ग्रहण करते है  चर्चा काफी अच्‍छी रही आप सभी का आभार । सादर

Comment by Dr. Rakesh Joshi on January 7, 2016 at 8:24pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, 
सादर नमस्कार. 
मेरी ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद. 
मैं आपका आभारी हूँ. 
सादर,
डॉ. राकेश जोशी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 7, 2016 at 6:15pm

आदरनीय डा. राकेश भाई , स्व. दुश्यंत कुमार की जमीन पर बहुत खूब सूरत गज़ल कही है , आपको दिली मुबारक बाद ग़ज़ल के लिए ।
मै भी आदरनीय समर भाई जी की सलाह से सहमत हूँ -- आपकी गज़ल मे क़ाफिया दोष पूर्ण है , खयाल कीजियेगा ।

मतले मे -- कोहरा और मोहरा शब्द लेकर आपने काफिया - ओहरा तय किया है , इस्के अनुसार आपका - पहरा , गहरा सहरा और बहरा  को हम काफिया लेना गलत है । यहाँ आपका काफिया -  अहरा  - तय हो रहा है ॥

Comment by Samar kabeer on January 6, 2016 at 12:23pm
जनाब राकेश जोशी जी,आदाब,दुष्यंत कुमार को मैंने पढ़ा ही नहीं,क़रीब से सुना भी है,दुष्यंत कुमार उर्दू भाषा बहुत अच्छी तरह जानते थे,और उर्दू शब्दों की अदायगी सही तसलफ़्फ़ुज़ के साथ करते थे,ये उनकी बड़ी ख़ूबी थी ,ज़्यादातर ग़ज़लकार ऐसे मौक़े पर दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल का हवाला देते हैं,दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल में 'अलिफ़' का क़ाफ़िया है जो आज़ाद है,आपका क़ाफ़िया है 'हरा' अब इस क़ाफ़िये का पहला शब्द 'को' ,'मो','दो' से शुरू हो रहा है और मतले के दोनों मिसरों में इसी क़ाफ़िये का पालन किया गया है इसलिए ग़ज़ल विधा के अनुसार अगले शैरों में भी इसकी पाबन्दी करना लाज़िम हो जाता है,इसलिये आपकी ग़ज़ल में क़ाफ़िया दोष है,इसे दूर करने की कोशिश करें,मेरी बात को कृपया अन्यथा न लें ।
Comment by Dr. Rakesh Joshi on January 5, 2016 at 9:02pm

आदरणीय समर कबीर जी,

सादर नमस्कार.

मेरी ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद.

मैं आपका आभारी हूँ.

ग़ज़ल के तकनीकी पक्ष में मैं ज़रा कमज़ोर हूँ. शब्द की त्रुटि स्वीकार्य है. ट्रांस्लितेरते करने में अक्सर ऐसा हो जाता है, पर कमी मेरी है. रहा सवाल क़ाफ़िए का तो

दुष्यंत कुमार की एक ग़ज़ल है शायद इससे कुछ बात बने:

 

एक कबूतर चिठ्ठी ले कर पहली-पहली बार उड़ा
मौसम एक गुलेल लिये था पट-से नीचे आन गिरा

बंजर धरती, झुलसे पौधे, बिखरे काँटे तेज़ हवा
हमने घर बैठे-बैठे ही सारा मंज़र देख लिया

चट्टानों पर खड़ा हुआ तो छाप रह गई पाँवों की
सोचो कितना बोझ उठा कर मैं इन राहों से गुज़रा

सहने को हो गया इकठ्ठा इतना सारा दुख मन में
कहने को हो गया कि देखो अब मैं तुझ को भूल गया

धीरे-धीरे भीग रही हैं सारी ईंटें पानी में
इनको क्या मालूम कि आगे चल कर इनका क्या होगा

सादर,

डॉ. राकेश जोशी

Comment by Dr. Rakesh Joshi on January 5, 2016 at 8:45pm

आदरणीय सुशील जी,
सादर नमस्कार.
मेरी ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद.
मैं आपका आभारी हूँ.
सादर,
डॉ. राकेश जोशी

Comment by Dr. Rakesh Joshi on January 5, 2016 at 8:45pm

आदरणीय शेख शहज़ाद जी,
सादर नमस्कार.
मेरी ग़ज़ल पर आपकी टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद.
मैं आपका आभारी हूँ.
सादर,
डॉ. राकेश जोशी

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