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हर मेंढक अपनी पसंद का कुँआँ खोजता है

मिल जाने पर उसे ही दुनिया समझने लगता है

 

मेढक मादा को आकर्षित करने के लिए

जोर जोर से टर्राता है

पर यह पूरा सच नहीं है

वो जोर जोर से टर्राकर

बाकी मेंढकों को अपनी ताकत का अहसास भी दिलाता है

और बाकी मेंढकों तक ये संदेश पहुँचाता है

कि उसके कुँएँ में उसकी अधीनता स्वीकार करने वाले मेंढक ही आ सकते हैं

 

गिरते हुए जलस्तर के कारण

कुँओं का अस्तित्व संकट में है

और संकट में है कुँएँ के मेंढकों का भविष्य

इसलिए वो जोर शोर से टर्रा रहे हैं

 

मैं अक्सर यह सोचकर काँप जाता हूँ

कि यदि कुँएँ के इन मेंढकों को

ब्रह्मांड की विशालता

और अपने कुँएँ की क्षुद्रता का अहसास हो गया

तो वो सबके सब सामूहिक आत्महत्या कर लेंगे

 

जो वाद

प्रतिवाद नहीं सह पाता

मवाद बन जाता है

 

समय इंतज़ार कर रहा है

घाव के फूट कर बहने का

------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 829

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 17, 2016 at 10:47pm

शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 17, 2016 at 10:46pm

शुक्रिया आदरणीया ममता जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 17, 2016 at 10:46pm

शुक्रिया आदरणीय रवि जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 12, 2016 at 4:02pm

आदरणीय धर्मेन्द्र भाई , संकेतों मे आपने आज की स्थिति का अच्छा अयान किया है , बधाई आपको ।

Comment by Mamta on January 12, 2016 at 1:49pm
धर्मेंद्र भाई बहुत सुंदर! गहन सोच व समाज की स्थिति का सटीक आकलन करती आपकी रचना पसंद आई।
सादर ममता
Comment by Ravi Shukla on January 11, 2016 at 12:08pm

आदरणीय धर्मेन्‍द्र जी अतुकांत में सीधी और सच्‍ची बात कह दी आपने बधाई स्‍वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

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