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वो छुपाते रहे अपना दर्द

अपनी परेशानियाँ

यहाँ तक कि

अपनी बीमारी भी….

 

वो सोखते रहे परिवार का दर्द

कभी रिसने नहीं दिया

वो सुनते रहे हमारी शिकायतें

अपनी सफाई दिये बिना ….

 

वो समेटते रहे

बिखरे हुये पन्ने

हम सबकी ज़िंदगी के …..

 

हम सब बढ़ते रहे

उनका एहसान माने बिना

उन पर एहसान जताते हुये

वो चुपचाप जीते रहे

क्योंकि वो पेड़ थे

फलदार

छायादार ।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by नादिर ख़ान on February 8, 2016 at 6:03pm

आदरणीय नीरज जी आपने रचना में अपना कीमती वक़्त दिया बहुत आभार आपका। ... 

Comment by नादिर ख़ान on February 8, 2016 at 6:02pm

आदरणीय  सौरभ सर  आपकी  टिप्पणी सदैव मार्गदर्शन  प्रदान करती है, तहे  दिल से आपका शुक्रिया ...  

Comment by नादिर ख़ान on February 8, 2016 at 6:02pm

आदरणीय तेजवीर साहब आपने रचना को जो  मान दिया उसका बहुत शुक्रिया

Comment by नादिर ख़ान on February 8, 2016 at 6:02pm

आदरणीया राहिला जी हौसला अफ़ज़ाई  का  बहुत बहुत शुक्रिया ....लेखन सार्थक हुआ ।  

Comment by Neeraj Neer on February 5, 2016 at 10:48pm

बहुत सुंदर .... पिता ऐसे ही होते हैं 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 5, 2016 at 10:34pm

इस प्रस्तुति के नायक के प्रति नमन !

एक सशक्त एवं सार्थक रचना केलिए हार्दिक धन्यवाद, नादिर भाई. 

Comment by TEJ VEER SINGH on February 5, 2016 at 10:28am

हार्दिक बधाई आदरणीय नादिर खान साहब  जी!बेहतरीन प्रस्तुति!

Comment by Rahila on February 4, 2016 at 11:33am
सही मायनों में जो पिता है उनका बहुत खूबसूरत और प्यारा चित्रण किया आपने आदरणीय नादिर खान साहब! हार्दिक बधाई आपको ।आदाब
Comment by नादिर ख़ान on February 4, 2016 at 11:16am

जनाब सलीम  शेख साहब हौसला अफ़ज़ाई के लिए, तहे दिल से आपका शुक्रिया। 

Comment by नादिर ख़ान on February 4, 2016 at 11:15am

आदरणीय मिथिलेश जी आपकी सराहना से धन्य हुआ। अभी भी आशंकित हूँ कि भावों को कविता का रूप दे पाया या नहीं
वैसे अपनी अतुकांत रचनाओं को लेकर हमेशा संशय में रहता हूँ । आपकी टिप्पणी से संतोष मिला, सीखना जारी है ...

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