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शहीद हनुमन्थप्पा के नाम [अतुकांत ... प्रतिभा पांडे ]

ठिठका तो था वो 

एक पल को देहरी पर 

और फिर निकल गया I

शायद सुन ली होंगी

घर के अन्दर से आती हुई आवाजें

मुट्ठी भींचे ,नारे लगाती,

भ्रामित भी था

कि बाहर से आ रही हैं 

या घर के अन्दर से 

कि बाहर की  ऐसी ही आवाजों को 

रोकने के लिये ही तो 

ओढ़ी थी सफ़ेद मौत उसने 

फिर ये घर के अन्दर से कैसे ?

समझ नहीं सका होगा कुछ 

और फिर थक कर

 निकल गया उस पार 

हर भ्रम से दूर I  

मौलिक व् अप्रकाशित 

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 17, 2016 at 8:40pm
कई संदेश समेटे देशप्रेम, देशभक्ति व मार्मिक भाव पूर्ण रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी।
Comment by pratibha pande on February 17, 2016 at 7:22pm

धन्यवाद आदरणीय लक्ष्मण भाई जी ,  आप रचना पर आये और उत्साहवर्धन किया 

Comment by pratibha pande on February 17, 2016 at 7:20pm

धन्यवाद राहिला जी ,आपने रचना को मान दिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2016 at 11:40am

आ0 प्रतिभा बहन सुंदर रचना हुइ है हार्दिक बधाई ।

Comment by Rahila on February 15, 2016 at 7:16pm
बेहद मार्मिक और भावुकता का सागर समेटे रचना हुई आदरणीया
प्रतिभा दी! सादर नमन

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