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ग़ज़ल ( क्या ज़रूरत थी मुस्कराने की )

ग़ज़ल ( क्या ज़रूरत थी मुस्कराने की )

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2122 ------1212 ------22

फ़ितरते बर्क़ है जलाने  की /

ख़ैर क्या मांगें  आशियाने की /

जाँ अगर लेनी थी बता देते

क्या ज़रूरत थी मुस्कराने की /

उनकी आदत है जुल पे जुल देना

और अपनी फ़रेब   खाने की /

छिन गई नींद लुट गया है सुकूं

ये सज़ा पायी दिल लगाने की /

पास जाके  भी देखते कैसे

उनकी आदत है मुंह छुपाने की/

घर किराये के ख़ूब मिलते हैं

क्या ज़रूरत मकाँ बनाने की /

इश्क़ तस्दीक़ करने से पहले

आदतें डालिये निभाने की /

(मौलिक व अप्रकाशित ) 

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Comment

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 20, 2016 at 9:56pm

जनाब मोहन बेगोवाल  साहिब ,   हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया

Comment by मोहन बेगोवाल on February 20, 2016 at 5:35pm

 सुंदर ग़जल -आदरनीय तस्दीक जी बधाई हो 

कृपया ध्यान दे...

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