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ग़ज़ल - जब किसी लब पे कोई दुआ ही नहीं -- गिरिराज भंडारी

212   212   212   212 

जीत उसको मिली जो लड़ा ही नहीं

कौन सच में लड़ा ये पता ही नही

 

साजिशों से अँधेरा किया इस क़दर  

कब्र उसकी बनी जो मरा ही नहीं

 

झूठ के पाँव पर मुद्दआ था खड़ा

पर्त प्याज़ी हठी, कुछ मिला ही नहीं

 

यूँ बदी अपना खेमा बदलती रही

अब किसी के लिये कुछ बुरा ही नहीं

 

इन ख़ुदाओं को देखा तो ऐसा लगा

इस जहाँ में कहीं अब ख़ुदा ही नहीं

 

छोड़ दी जब गली, नक्श भी मिट गये

चाहतें क्या रहें ? जब गिला ही नहीं 

 

क्या कुबूल अब ख़ुदा भी करे सोचिये

जब किसी लब पे कोई दुआ ही नहीं

 

जिसने समझा मुझे उसने देखा मुझे  

मुझको खोजो नहीं, मै छिपा ही नहीं

************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2016 at 8:39am

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी . आपकी मुखर सराह्ना ने गज़ल कहाना  सार्थक कर दिया । आपका हृदय से आभार ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 24, 2016 at 7:20pm

आ० अनुज  किस पर दाद दूं और कसे बख्श्दूं  आपने कोई मौक़ा ही नहीं दिया सभी मोटी स्वच्छ  और सजीले  . लाजवाब . 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 24, 2016 at 4:33pm

आदरनीया कांता जी , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 24, 2016 at 4:32pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

Comment by kanta roy on February 24, 2016 at 12:24pm
बहुत ही खूबसूरत गजल कही है आपने आदरणीय गिरीराज जी । शेर दर शेर ने वाकई में लाजवाब कर दिया है ।

झूठ के पाँव पर मुद्दआ था खड़ा
पर्त प्याज़ी हठी, कुछ मिला ही नहीं...... वाह ! कितना कुछ है इन प्याजी पर्तों में ।
इस बेहतरीन गजल को कहने और इसके फीचर पोस्ट का सम्मान पाने हेतु ढेरों बधाइयां प्रेषित है आपको । सादर ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 24, 2016 at 11:38am

आ० भाई गिरिराज जी , इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

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