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फाउंटेन पेन (लघुकथा)

उस जमाने में बी ए प्रथम श्रेणी से पास होने पर बाबू जी को कालेज के प्राचार्य ने पारितोषिक स्वरूप दिया था ।बाबू जी ने न जाने कितनी कहानियाँ,कविताएँ लिखी इस पेन से। हमेशा उनकी सामने की जेब में ऐसे शोभा बढ़ाये रखता जैसे कोई तमगा लगा हो। मेरी पहली कहानी सारिका में प्रकाशित होने पर बाबू जी ने प्रसन्न हो कर मेरी जेब में ऐसे लगाया जैसे कोई मेडल लगा रहे हों और साथ में हिदायत दी कि इस पेन से कभी झूठ नहीं लिखना,और न ऐसा सच जिससे किसी का अहित हो। आज बाबू जी की पुण्य तिथि पर उनकी तस्वीर पर माला चढा कर ,पेन साफ कर स्याही भर के शर्ट के सामने की जेब में खोंस कर एक सिपाही की तरह सीना तान कर कार्यालय पहुंचा। लिखने के लिए एक दो बार पेन निकाला पर हाथ कांप गये,कुछ न लिख सका । मैं कचहरी का बड़ा बाबू दिन भर खोंसे रहा उस पेन को घर आकर पिता जी की फोटो के साथ टिका दिया ।

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पवन जैन ,जबलपुर।
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Pawan Jain on February 28, 2016 at 4:28pm

आभार आदरणीय शहजाद जी सुंदर  समीक्षा हेतु।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on February 27, 2016 at 11:30pm
बेहतरीन प्रेरक अभिव्यक्ति के लिए हृदयतल से बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय पवन जैन जी।
Comment by Pawan Jain on February 27, 2016 at 8:00pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायण साहेब।

Comment by Pawan Jain on February 27, 2016 at 7:58pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय राहिला जी ,आपकी तारीफ उत्तरदायित्व बढाती है ,बेहतरी हेतु प्प्रयास रत रहूंगा।

Comment by Rahila on February 27, 2016 at 7:38pm
बहुत गहरा कटाक्ष कोट कचहरी की कार्य शैली पर । आपकी रचनायें पढ़कर बेहद अच्छा लगता है आदरणीय सर जी! सादर नमन
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 27, 2016 at 6:17pm

इस बेबाक कथन के लिय बधाई .

Comment by Pawan Jain on February 27, 2016 at 3:53pm

आभार आदरणीय अवधेश कुमार जी ।

Comment by Awadhesh Kumar on February 27, 2016 at 3:32pm

मजबूर हो चुके ईमानदार व्यक्तित्व की झलक

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