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कर रहा क्या करम धर्म के नाम पर

आदमी बेशरम धर्म के नाम पर

दान की लाडली देव घर के लिये 
बन गये वो हरम धर्म के नाम पर

लूटते मारते काटते आदमी
ज़न्नतों का भरम धर्म के नाम पर

​​कर दिये हैं फ़ना बेजुबां जानवर

​जुल्म का है चरम धर्म के नाम पर

कौन साईं हुये?और शनि देव है?
है बहस ये गरम धर्म के नाम पर

मिट गया बाँकपन खोइ शालीनता
भाड़ में गइ शरम धर्म के नाम पर

(मौलिक एवं अप्रकाशित) ​​

​​

 

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 3, 2016 at 3:49pm

पटल पे स्थान देने हेतु संपादक मंडल का हार्दिक आभार ....

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 3, 2016 at 3:39pm

धन्यवाद आदरणीय Shyam Narain जी... 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 3, 2016 at 3:39pm

धन्यवाद आदरणीय laxman dhami जी... 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 3, 2016 at 3:34pm

धन्यवाद आदरणीय गिरिराज भंडारी जी आगे से ख्याल रखूँगा ....

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 3, 2016 at 3:32pm

धन्यवाद आदरणीय Ravi Shukla  जी...हाँ ये ग़लती हुई है कि बहर का उल्लेख नहीं किया...आइन्दा ख्याल रखूँगा वैसे ग़ज़ल की बहर २१२ २१२ २१२ २१२ है..


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 1, 2016 at 9:01pm

आदरणीय बृजेश ब्रज भाई , अच्छी गज़ल कही है , दिली बधाइयाँ आपको । आदरनीय रवि भाई जी के बात से मै भी सहमत हूँ म बहर का उल्लेख ज़रूर किया कीजिये , ऊपर ।

Comment by Ravi Shukla on March 1, 2016 at 5:58pm

आदरणीय बृजेश जी बधाई इस गजल के लिये  दो जगह  आपने शर्म को श्‍ारम लिया है 21 की जगह 12 इससे मिसरा बह्र में नहीं हो रहा । गजल से पहले उसका अरकान लिखने का निवेदन है है मंच का नियम भी है । सादर

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 1, 2016 at 11:39am

हार्दिक बधाई

Comment by Shyam Narain Verma on February 29, 2016 at 12:42pm
बहुत उम्दा ... बहुत बहुत बधाई

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