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बस इतनी सी चाहत(अतुकान्त कविता )

कहीं कुछ टूटता सा महसूस होता है
कहीं कोई डाली चटक सी जाती है
क्यों अस्तित्व खुद ही बिखर रहा है
हर शख्स जीवन से मुकर रहा है
बस एक धारा बनना चाहा
जो समेटे रहती ध्वनि कल-कल
बहती रहती सदा यूँ ही अविरल
सरोकार न होता जिसे सुख से
न दर्द  होता किसी दुःख से
पहचान न होती किसी पाप की  
न चाहत होती किसी पुण्य की
काश,रह पाता वैसे ही निष्छल
फिर सोचा.......
क्यों न नींव का पत्थर हो जाऊँ
धरती माँ कि गोद में
कहीं गहराई में आराम से सो जाऊँ
जहाँ शाश्वत सत्य अँधेरा हो
न रहे इंतज़ार कभी ,कोई  सवेरा हो
अपना लेता उस अनन्त स्थिरता को
पा लेता उस परब्रह्म परसत्ता को
ए काश मैं झोंका हवा का होता
इधर-उधर ,यहाँ से वहाँ
बहता हर बन्धन से परे
हर किसी का प्यारा होता
जीने का कुछ तो सहारा होता
उड़ता असमानों में बादलों के संग
बरसता बूँदों के संग बन के
जीवन की नयी उमंग
छन भर,ठिठक जाता किसी छत की मुंड़ेर पे
बिखर जाता खुश्बू सा किन्ही मुस्कुराहटों संग

मौलिक एवं अप्रकाशित 

©बृजेश कुमार 'ब्रज '

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 7, 2016 at 9:51pm

शत शत नमन एवं धन्यवाद आदरणीय मिथिलेश वामनकर  जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 7, 2016 at 12:08am

इस भावपूर्ण प्रस्तुति पर बधाई आदरणीय 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 4, 2016 at 12:33pm

आपका हार्दिक अभिनन्दन आदरणीया kanta roy  जी 

Comment by kanta roy on March 4, 2016 at 10:09am
बहुत खूबसूरत भावपूर्ण रचना बनी है यह आदरणीय बृजेश जी । बधाई स्वीकार करें ।

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