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पुन्न (पुण्य) लधु कथा

पुन्न (पुन्य)

आज बड़ी बुआ आ गई,थैला और पेटी के साथ ।
"ये लल्लू ,पइसा दे दे रिक्शा बाले को,मेरे पास फुटकर नहीं हैं ।"
रिक्शा के पैसे दे ,चरणस्पर्श का आशीर्वाद लेकर पेटी अम्मा के कमरे में रख दी ।बुआ ने पेटी पलंग के नीचे खिसका ,ताला हिला कर तसल्ली कर ली ।इस बार पेटी कुछ ज्यादा ही भारी है।पेटी पर लगा अलीगढ़ी ताला ,जिसकी चाबी उनके गले में पड़ी तीन तोले की चेन में लटकी रहती ।
क्या किस्मत है,इस लोहे की चाबी की ,चौदह वर्ष की उम्र से ब्लाउज के अंदर उनके साथ। बाल विधवा बुआ ने अपने ससुराल में रहकर ही, मिडिल स्कूल के प्रधानाचार्य तक की नौकरी की। जेठ और देवर की नजरों को ठुकरा कर,जमीन जायदाद में तीसरा हिस्सा लिया ।
"भौजी अब हांथ पांव नहीं चलते ,अब तो तुम्हारी चौखट से ही अर्थी उठेगी।"
"ऐसा क्यों कहती हो जीजी ,अभी अस्सी की ही
तो हुई हो ।"
"बसेसर अस्सी में ही तो गया था ,मैं क्या अमृत पी कर आई हूँ ।"
"भगवान तुम्हें लम्बी उमर दे जीजी।"
"ये लल्लू बुला सब को अब इस चाबी का वजन मुझ से नहीं उठता ।"और खोल दिया पिटारा ।
"ये लल्लू पकड़ जे एफ डी गुड़िया की शादी को,कहीं कोई कमी न राखियो ,जे पप्पू की पढ़ाई लिखाई को, सब तुम्हारे दस्तखत से ही बनी है।"
"अभी रखो अपने पास ।"
" नहीं, भौजी अब जा चेन तुम पहन लो तो मुझे चैन आ जाय और सम्हालो जा पेटी जिसको जो देने होए तुम जानो ।"
पत्नी से कहा "उठो बुआ को चाय बना लाऔ।"
"का चाय बना लाये ,एक लोंग तक तो निकरी नहीं हमारे लाने।"
अम्मा बोल पडी़,"फिकर न कर बहुरिया ,सब तुम्हारे लाने है,जा धरी पेटी और चाबी।"

"पहले कछू पुन्न तो कमा लो।"

पवन जैन,जबलपुर ।
(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Pawan Jain on March 24, 2016 at 9:57am

आभारी हूँ आदरणीय TEJ VEER SINGH jee आपको कथा पसंद आई ।

धन्यवाद आदरणीय नयना जी ,कथा की सराहना हेतु ।

Comment by नयना(आरती)कानिटकर on March 22, 2016 at 5:07pm
आ.जैन सर बहुत सुंदर रचना
Comment by TEJ VEER SINGH on March 22, 2016 at 11:39am

हार्दिक बधाई पवन जैन जी!बेहतरीन लघुकथा!

Comment by Pawan Jain on March 22, 2016 at 10:21am

धन्यवाद आदरणीय राहिला जी आपको कथा पसंद आई ।

Comment by Rahila on March 21, 2016 at 9:05pm
बहुत अच्छी प्रस्तुति आदरणीय सर जी! बहुत बधाई ।सादर नमन

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