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नयना(आरती)कानिटकर
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नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-34 (विषय: "इतिहास")
"आ.भाई जी  सादर प्रणाम, हाँ मैने यह बताने का प्रयास किया है कि दूनिया चाहे कितनी भी बदल जाए पूरूष का नजरिया एक स्त्री के प्रति कभी नहीं बदलता. वो उससे दैहिक प्रेमकर इतिहास गढने की इच्छा रखता है जबकी स्त्री इतिहास बदले की इच्छुक हैं और जब वह उसे…"
Jan 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-34 (विषय: "इतिहास")
"  "दो ध्रुव"---उन दिनों सुलेखा एक खूशबू की तरह उसके वजूद पर छायी हुई थी.  बहुत ख्याल रखता था वह उसका.  शरीर के कण-कण मे विराजमान प्यार में  वह अपना वजूद खोता जा रहा था.…"
Jan 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post सुबह की धूप
"अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jan 10
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post सुबह की धूप
"आद0 नयना जी सादर अभिवादन।बढ़िया लघुकथा लिखी आजन, इस प्रस्तुति पर बधाई।सादर"
Jan 8
Samar kabeer commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post सुबह की धूप
"मोहतरमा नयना जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 7
नयना(आरती)कानिटकर posted a blog post

सुबह की धूप

 खुद को भूली वो जब दिन भर के काम निपटा कर अपने आप को बिस्तर पर धकेलती तो आँखें बंद करते ही उसके अंदर का स्व जाग जाता और पूछता " फिर तुम्हारा क्या". उसका एक ही जवाब "मुझे कुछ नहीं चाहिए. कभी ना कभी तो मेरा भी वक्त आएगा. उसे याद है अपने छोटे से घर की खिड़की के पास हमेशा डेरा डाले रहती.  हाथ में  अभ्यास की पुस्तक और बाहर के आंगन का सारा नज़ारा उसका अपना होता. कभी ढेर सारे तोते आ बैठे अमरुद पर खूब शोर मचाते. कभी-कभी चिड़िया आ बैठती मुंडेर पर वो दौडकर दाना लाती और जैसे ही बिखेरती वो फुर्र से उड जाती…See More
Jan 6
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"कल्पना रचना को एक बार फिर से पढ़ो. जवाब उसी में हैं। सादर"
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आ.भाई जी मैंने तो रचना के बीच ही माना है कि पूरे ढके शरीर को देखती गंदी नजरे याद या गई । मगर ट्रायलरूम से बाहर निकलते वक्त तमाचे जडने की बात इसीलिए की हैं। सादर इसे अधिक स्पष्टता के साथ कहने की कोशिव करती हूँ।"
Nov 30, 2017
डॉ छोटेलाल सिंह left a comment for नयना(आरती)कानिटकर
"आदरणीया नयना जी आपने लघुकथा के माध्यम से जो चित्र खींचा वह मर्मस्पर्शी है बहुत ही रोचक और प्रभावकारी है बहुत बहुत मुबारकबाद इस महान उपलब्धि के लिए"
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आ.  विनय  जी सुदर कथा सृजन हेतु हार्दिक बधाई"
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आ. लक्ष्मण लडीवाला जी  बढ़िया रचना विषय पर, बधाई आपको "
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आ. अनुपमा जी प्रदत्त विषय से न्याय करती रचना हेतु अनेकानेक बधाई"
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आदरणीय नीता जी बहुत बढ़िया रचना ,बधाई "
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आम कुसुम जी प्रदत्त विषय पर अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"वाह!वाह क्या बढिया लघुकथा कही हैं आपने. अलग-अलग विषय और उनका निर्वाह करना तो कोई आपसे सीखे. बधाई आपको इस रचना के लिए"
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आम विजय जी वैसे वसुधा जी बता चुकी है.सहभागिता हेतु बधाई"
Nov 30, 2017

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Female
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Bhopal
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BHopal
Profession
S.A
About me
i try to learn every thing which possible for me.taking interest in reading & writing

नयना(आरती)कानिटकर's Blog

सुबह की धूप

 खुद को भूली वो जब दिन भर के काम निपटा कर अपने आप को बिस्तर पर धकेलती तो आँखें बंद करते ही उसके अंदर का स्व जाग जाता और पूछता " फिर तुम्हारा क्या". उसका एक ही जवाब "मुझे कुछ नहीं चाहिए. कभी ना कभी तो मेरा भी वक्त आएगा. उसे याद है अपने छोटे से घर की…

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Posted on January 6, 2018 at 6:45pm — 3 Comments

हस्तरेखा (लघुकथा)

"इतना मान-सम्मान पाने वाली, फिर भी इनकी हथेली खुरदरी और मैली सी क्यों है?"-- हृदय रेखा ने धीरे-धीरे बुदबुदाते हुए दूसरी से पूछा तो हथेली के कान खड़े हो गए।

"बडे साहसी, इनका जीवन उत्साह से भरपूर है,फिर भी देखो ना..." मस्तिष्क रेखा ने फुसफुसा कर ज़बाब दिया।

" देखो ना! मैं भी कितनी ऊर्जा लिए यहाँ हूँ, किंतु हथेली की इस कठोरता और गदंगी से.....!" जीवन रेखा भी कसामसाई।

"अरे! क्यों नाहक क्लेष करती हो तुम तीनों? भाग्य रेखा…

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Posted on October 7, 2017 at 4:00pm — 11 Comments

वो दिन---

"तुम रातभर बैचेन थी। हो सके तो आज आराम करो। मैंने चाय बनाकर थर्मस में डाल दी हैं। मैं नाश्ता, खाना आफ़िस में ही ली लूँगा, तुम बस अपना बनवा लेना। आफ़िस से छुट्टी ले लो।"

पास तकिए पर रखे कागज को पढा और चूमकर सीने पर रख लिया। आफ़िस में इस एक दिन के अवकाश की लड़ाई लड़ी और जीती भी थी।

चाय का कप लेकर बालकनी में आई तो सहज ही प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनती उन लड़कियों पर नजर गयी। उफ्फ, ये लोग क्या करती होंगी इन दिनों? कप हाथ में लिए-लिए ही झट नीचे आयी। उन्हें आवाज लगाकर अपने…

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Posted on September 25, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

"दो घडी का सुख"

उसने सिला गये बेसन  को थाली में फैलाकर चूल्हे  की गरम राख को थोडा सार कर उस  पर रख दिया था ताकि पसीजन से आई बदबू  खत्म हो जाए. आज पहली बार रमेश्या ने उसे ढाई सौ ग्राम तेल लाकर दिया था घर में. वरना तो वह अपनी सारी कमाई शराब में ही फूक देता था. वह  भी काम से आते वक्त बीबी जी से दो प्याज माँगकर ले आई थी.

बाहर आसमान भी आज उसके घर में खुशी बरसाने के भाव मे था. चाँद का उजाला ना सही इस छोटे से सुख में  घुमडते बादलों सा उसका मन झूम-झूम उठा  था.

"आज ही तो तू आई थी मेरे जीवन में…

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Posted on July 31, 2017 at 7:45pm — 11 Comments

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At 7:45pm on November 30, 2017, डॉ छोटेलाल सिंह said…
आदरणीया नयना जी आपने लघुकथा के माध्यम से जो चित्र खींचा वह मर्मस्पर्शी है बहुत ही रोचक और प्रभावकारी है बहुत बहुत मुबारकबाद इस महान उपलब्धि के लिए
At 2:01pm on September 3, 2013, annapurna bajpai said…

welcome ,Nayana ji in our O B O family . 

 
 
 

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