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नयना(आरती)कानिटकर
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post साक्षात्कार
"आ. नयना जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
May 12
Samar kabeer commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post साक्षात्कार
"मुहतरमा नयना जी आदाब, अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
May 9
नयना(आरती)कानिटकर posted a blog post

साक्षात्कार

उत्कर्षा का सारा शरीर थककर चूर हो चुका था कब नींद के आगोश में चली गयी पता ही नहीं चला ।"हे ईश्वर ये किस पाप की सजा दी है तूने ये जन्म देकर जहाँ दो घड़ी का चैन नहीं ।""ऐसा क्यों कहती हो ,सतत कर्मशीलता ही तो भरी है मैंने तुम्हारी पेशियों में . क्या गलत किया?""प्रभु ! मैं भी कोई मशीन तो नहीं हूँ की ये सतत परिश्रमशीलता..""जानता हूँ ये सब सोचकर ही मैंने तुम्हें अष्टभुजा का प्रतिक रूप दिया है।""अष्टभुजा??? या कि...सारा श्रेय तो ..किंतु ..""किन्तु क्या , देखो ना तुम्हें किसी के सहारे की जरुरत कहाँ पडी…See More
May 8
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-108 in the group चित्र से काव्य तक
"  छन्न पकैया छन्न पकैया,दे दू तुझको रोटी,  जीवन यू ही तर जाना है , रहे आस ना झूटी | छन्न पकैया छन्न पकैया, दर्द मिला इस जग से  भूल पुरानी यादों को सब,  जागे नयन सपन से | छन्न पकैया छन्न पकैया, मन की बात…"
Apr 18
Samar kabeer commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post "मैं आ रही हूँ माँ....."
"मुहतरमा नयना (आरती) कानिटकर जी आदाब, अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 15
नयना(आरती)कानिटकर posted blog posts
Mar 14
नयना(आरती)कानिटकर commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post लघुकथा : सब्जीवाला (गणेश जी बाग़ी)
" वाह! वाह बहुत ही समसामयिक लघुकथा है सर. चारों तरफ़ इन सम्मान देनेवालो का शोर सा मचा हैं और खरिदने वाला कुछ भी दाम देने को तैयार. मुझे खासकर "शीर्षक" बहुत पसंद आया. "
Mar 6
नयना(आरती)कानिटकर posted a blog post

मैं और मेरा मन

पहन रखा हैं  मैने गले में, एकगुलाबी चमक युक्त बडा सा मोती जिसकी आभा से दमकता हैं       मेरा मुखमंडल  मैं भी घूमती हूँ  इतराती हुई उसके नभमंडल में किंतु नहीं जानती थी समय के साथ होगा बदलाव उसमें भी धूप, बादल, बारिश आंधी के थपेड़ो को झेलते बदलेगा उसका तेज बुरी, काली,झपटने को आतुर  लोंगो की नज़रों से बदलेगा उसका वैभव अब तक उसे हथेली की अंजुरी में रख निहारने वाली मैं निस्तब्ध हूँ कोशिश में लगी हूँ कि अब ढक लू उसे हथेलियों से कि ना पड़े ऐसी कोई दृष्टि जो खत्म कर दे  उसकी भव्यता  और तब गले में लटका…See More
Jun 25, 2019
नयना(आरती)कानिटकर commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"आ. विजय जी, सुशिल जी, डा. छोटेलाल जी आप सभी का आभार.समर जी अवश्य सुधार करती हूँ."
Jun 25, 2019
vijay nikore commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"भाव अच्छे पिरोय हैं। रचना अच्छी लगी। बधाई आदरणीया नयना जी।"
Jun 23, 2019
Samar kabeer commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"मुहतरमा नयना(आरती)कानिटकर जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'मैं भी घूमती हूँ  ईतराती हुई' इस पंक्ति में 'ईतराती' को "इतराती" कर लें ।"
Jun 23, 2019
Sushil Sarna commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"आदरणीया जी अंतर्मन के भावों को चित्रित करती इस भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई।"
Jun 22, 2019
डॉ छोटेलाल सिंह commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"आदरणीया नयना जी बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना के लिए बहुत बहुत बधाई"
Jun 21, 2019
नयना(आरती)कानिटकर posted a blog post

मैं और मेरा मन

पहन रखा हैं  मैने गले में, एकगुलाबी चमक युक्त बडा सा मोती जिसकी आभा से दमकता हैं       मेरा मुखमंडल  मैं भी घूमती हूँ  इतराती हुई उसके नभमंडल में किंतु नहीं जानती थी समय के साथ होगा बदलाव उसमें भी धूप, बादल, बारिश आंधी के थपेड़ो को झेलते बदलेगा उसका तेज बुरी, काली,झपटने को आतुर  लोंगो की नज़रों से बदलेगा उसका वैभव अब तक उसे हथेली की अंजुरी में रख निहारने वाली मैं निस्तब्ध हूँ कोशिश में लगी हूँ कि अब ढक लू उसे हथेलियों से कि ना पड़े ऐसी कोई दृष्टि जो खत्म कर दे  उसकी भव्यता  और तब गले में लटका…See More
Jun 20, 2019

Profile Information

Gender
Female
City State
Bhopal
Native Place
BHopal
Profession
S.A
About me
i try to learn every thing which possible for me.taking interest in reading & writing

नयना(आरती)कानिटकर's Blog

साक्षात्कार

उत्कर्षा का सारा शरीर थककर चूर हो चुका था कब नींद के आगोश में चली गयी पता ही नहीं चला ।



"हे ईश्वर ये किस पाप की सजा दी है तूने ये जन्म देकर जहाँ दो घड़ी का चैन नहीं ।"



"ऐसा क्यों कहती हो ,सतत कर्मशीलता ही तो भरी है मैंने तुम्हारी पेशियों में . क्या गलत किया?"



"प्रभु ! मैं भी कोई मशीन तो नहीं हूँ की ये सतत परिश्रमशीलता.."



"जानता हूँ ये सब सोचकर ही मैंने तुम्हें अष्टभुजा का प्रतिक रूप दिया है।"



"अष्टभुजा??? या कि...सारा श्रेय तो ..किंतु…

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Posted on May 8, 2020 at 7:52pm — 2 Comments

"मैं आ रही हूँ माँ....."

"मैं आ रही हूँ माँ..."

कितनी बार कहा था माँ ने "बेटा! बस एक बार तुम ग्रेजुएट हो जाओ फिर जहाँ भी किस्मत आजमाना चाहोगी तुम्हें रोकूँगी नही। ये पूरा का पूरा आकाश तुम्हारा हैं।" किंतु तब मैंने उनकी बातों को यूंही हवा में उड़ा दिया था।

संयुक्त परिवार में घर की सबसे खूबसूरत बेटी थी वह। बस! यही ज़रूर उसे ले डूबेगा कहाँ जानती थी। बारहवी के बाद ही अपनी रिश्तेदार के घर इस नगरी में आयी तो वापस लौटी ही नहीं कभी। माँ समझा-बुझाकर ले जाने आई थी उसे तब उन्हें…

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Posted on March 14, 2020 at 4:00pm — 1 Comment

मैं और मेरा मन

पहन रखा हैं 

मैने गले में, एक

गुलाबी चमक युक्त

बडा सा मोती

जिसकी आभा से दमकता हैं      

मेरा मुखमंडल 

मैं भी घूमती हूँ  इतराती हुई

उसके नभमंडल में…

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Posted on June 20, 2019 at 10:00am — 5 Comments

सुबह की धूप

 खुद को भूली वो जब दिन भर के काम निपटा कर अपने आप को बिस्तर पर धकेलती तो आँखें बंद करते ही उसके अंदर का स्व जाग जाता और पूछता " फिर तुम्हारा क्या". उसका एक ही जवाब "मुझे कुछ नहीं चाहिए. कभी ना कभी तो मेरा भी वक्त आएगा. उसे याद है अपने छोटे से घर की…

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Posted on January 6, 2018 at 6:45pm — 3 Comments

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At 7:45pm on November 30, 2017, डॉ छोटेलाल सिंह said…
आदरणीया नयना जी आपने लघुकथा के माध्यम से जो चित्र खींचा वह मर्मस्पर्शी है बहुत ही रोचक और प्रभावकारी है बहुत बहुत मुबारकबाद इस महान उपलब्धि के लिए
At 2:01pm on September 3, 2013, annapurna bajpai said…

welcome ,Nayana ji in our O B O family . 

 
 
 

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