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नयना(आरती)कानिटकर
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  • Bhopal,madhya pradesh
  • India
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नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
"आ.योगराज भाई जी इस पर किस तरह से पुन: विचार करु ? आपके सुझाव चाहूँगी."
Mar 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
"ह्रदयतल से आभार राजेश दीदी"
Mar 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
"आ. वीर जी  आपने मेरे प्रयास को सराहा इस हेतु धन्यवाद.काल्पनिकता के पुट के साथ ऐतिहासिक विषय पर यह मेरी पहली रचना हैं. आगे भाषा सहज रहे इसका ख्याल रखूँगी. वैसे बडे इत्तफ़ाक की बात है कि मै मृत्युंजय(मराठी) पढ ही रही हूँ और अचानक ओबीओ का विषय भी…"
Mar 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
"कल्पना शायद तुम इसे एकाध बार ओर पढो तो तुम्हे सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा. कभी-कभी जल्दी-जल्दी में रचनाएँ पढने पर ऐसा होता हैं. सस्नेह :)"
Mar 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
"आ.रवि दादा, आपकी टिप्पणी ने मेरी हौसला अफ़जाई की हैं दरअसल ऐतिहासिक विषय पर मैनें कल्पनात्मक रुप से पहली बार लिखा हैं. कुछ लोगो को मेरी भाषा क्लिष्ट लगी,लेकिन सच कह रही हूँ इस पर लिखते वक्त यही शब्द मेरे जेहन में उभरे फिर आपने भी कह दिया कि…"
Mar 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
"भाई जी क्षमा सहित . इस टंकण त्रुटी को संकलन में सुधार लेती हूँ. मेरे हस्त लिखित में "धृष्टद्युम्न" ही है .पता नही कैसे इतनी बडे गल्ति कर गई. सादर"
Mar 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
" आ. सुरेन्द्र इंसान जी .आपने बिल्कुल सही इंगित  किया हैं .यह मेरी तंकण त्रुटी है. "धृष्टद्युम्न" की जगह घटोत्कच लिख गई. आपके अत्यंत आभार गल्ति को इंगित करने हेतु. विस्तार से शाम को ६ के बाद लौटूँगी रचना पर. अभी व्यस्तत में आपका…"
Mar 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-36 (विषय: पराजित योद्धा)
""आर्तनाद" अब मैं और अर्जुन आमने-सामने थे. इस संग्राम में हम दोनों ही बराबर थे.कई बार पार्थ के धनुष की प्रत्यंचा काटने के बावजूद भी वे प्रकाश की गति समान पलक झपकते ही पुन: प्रत्यंचा चढ़ा लेते . हम दोनों के बीच दैवीय अस्त्रों के प्रयोग से…"
Mar 30
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-34 (विषय: "इतिहास")
"आ.भाई जी  सादर प्रणाम, हाँ मैने यह बताने का प्रयास किया है कि दूनिया चाहे कितनी भी बदल जाए पूरूष का नजरिया एक स्त्री के प्रति कभी नहीं बदलता. वो उससे दैहिक प्रेमकर इतिहास गढने की इच्छा रखता है जबकी स्त्री इतिहास बदले की इच्छुक हैं और जब वह उसे…"
Jan 31
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-34 (विषय: "इतिहास")
"  "दो ध्रुव"---उन दिनों सुलेखा एक खूशबू की तरह उसके वजूद पर छायी हुई थी.  बहुत ख्याल रखता था वह उसका.  शरीर के कण-कण मे विराजमान प्यार में  वह अपना वजूद खोता जा रहा था.…"
Jan 30
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post सुबह की धूप
"अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jan 10
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post सुबह की धूप
"आद0 नयना जी सादर अभिवादन।बढ़िया लघुकथा लिखी आजन, इस प्रस्तुति पर बधाई।सादर"
Jan 8
Samar kabeer commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post सुबह की धूप
"मोहतरमा नयना जी आदाब,अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 7
नयना(आरती)कानिटकर posted a blog post

सुबह की धूप

 खुद को भूली वो जब दिन भर के काम निपटा कर अपने आप को बिस्तर पर धकेलती तो आँखें बंद करते ही उसके अंदर का स्व जाग जाता और पूछता " फिर तुम्हारा क्या". उसका एक ही जवाब "मुझे कुछ नहीं चाहिए. कभी ना कभी तो मेरा भी वक्त आएगा. उसे याद है अपने छोटे से घर की खिड़की के पास हमेशा डेरा डाले रहती.  हाथ में  अभ्यास की पुस्तक और बाहर के आंगन का सारा नज़ारा उसका अपना होता. कभी ढेर सारे तोते आ बैठे अमरुद पर खूब शोर मचाते. कभी-कभी चिड़िया आ बैठती मुंडेर पर वो दौडकर दाना लाती और जैसे ही बिखेरती वो फुर्र से उड जाती…See More
Jan 6
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"कल्पना रचना को एक बार फिर से पढ़ो. जवाब उसी में हैं। सादर"
Nov 30, 2017
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-32
"आ.भाई जी मैंने तो रचना के बीच ही माना है कि पूरे ढके शरीर को देखती गंदी नजरे याद या गई । मगर ट्रायलरूम से बाहर निकलते वक्त तमाचे जडने की बात इसीलिए की हैं। सादर इसे अधिक स्पष्टता के साथ कहने की कोशिव करती हूँ।"
Nov 30, 2017

Profile Information

Gender
Female
City State
Bhopal
Native Place
BHopal
Profession
S.A
About me
i try to learn every thing which possible for me.taking interest in reading & writing

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सुबह की धूप

 खुद को भूली वो जब दिन भर के काम निपटा कर अपने आप को बिस्तर पर धकेलती तो आँखें बंद करते ही उसके अंदर का स्व जाग जाता और पूछता " फिर तुम्हारा क्या". उसका एक ही जवाब "मुझे कुछ नहीं चाहिए. कभी ना कभी तो मेरा भी वक्त आएगा. उसे याद है अपने छोटे से घर की…

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Posted on January 6, 2018 at 6:45pm — 3 Comments

हस्तरेखा (लघुकथा)

"इतना मान-सम्मान पाने वाली, फिर भी इनकी हथेली खुरदरी और मैली सी क्यों है?"-- हृदय रेखा ने धीरे-धीरे बुदबुदाते हुए दूसरी से पूछा तो हथेली के कान खड़े हो गए।

"बडे साहसी, इनका जीवन उत्साह से भरपूर है,फिर भी देखो ना..." मस्तिष्क रेखा ने फुसफुसा कर ज़बाब दिया।

" देखो ना! मैं भी कितनी ऊर्जा लिए यहाँ हूँ, किंतु हथेली की इस कठोरता और गदंगी से.....!" जीवन रेखा भी कसामसाई।

"अरे! क्यों नाहक क्लेष करती हो तुम तीनों? भाग्य रेखा…

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Posted on October 7, 2017 at 4:00pm — 11 Comments

वो दिन---

"तुम रातभर बैचेन थी। हो सके तो आज आराम करो। मैंने चाय बनाकर थर्मस में डाल दी हैं। मैं नाश्ता, खाना आफ़िस में ही ली लूँगा, तुम बस अपना बनवा लेना। आफ़िस से छुट्टी ले लो।"

पास तकिए पर रखे कागज को पढा और चूमकर सीने पर रख लिया। आफ़िस में इस एक दिन के अवकाश की लड़ाई लड़ी और जीती भी थी।

चाय का कप लेकर बालकनी में आई तो सहज ही प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनती उन लड़कियों पर नजर गयी। उफ्फ, ये लोग क्या करती होंगी इन दिनों? कप हाथ में लिए-लिए ही झट नीचे आयी। उन्हें आवाज लगाकर अपने…

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Posted on September 25, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

"दो घडी का सुख"

उसने सिला गये बेसन  को थाली में फैलाकर चूल्हे  की गरम राख को थोडा सार कर उस  पर रख दिया था ताकि पसीजन से आई बदबू  खत्म हो जाए. आज पहली बार रमेश्या ने उसे ढाई सौ ग्राम तेल लाकर दिया था घर में. वरना तो वह अपनी सारी कमाई शराब में ही फूक देता था. वह  भी काम से आते वक्त बीबी जी से दो प्याज माँगकर ले आई थी.

बाहर आसमान भी आज उसके घर में खुशी बरसाने के भाव मे था. चाँद का उजाला ना सही इस छोटे से सुख में  घुमडते बादलों सा उसका मन झूम-झूम उठा  था.

"आज ही तो तू आई थी मेरे जीवन में…

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Posted on July 31, 2017 at 7:45pm — 11 Comments

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At 7:45pm on November 30, 2017, डॉ छोटेलाल सिंह said…
आदरणीया नयना जी आपने लघुकथा के माध्यम से जो चित्र खींचा वह मर्मस्पर्शी है बहुत ही रोचक और प्रभावकारी है बहुत बहुत मुबारकबाद इस महान उपलब्धि के लिए
At 2:01pm on September 3, 2013, annapurna bajpai said…

welcome ,Nayana ji in our O B O family . 

 
 
 

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