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नयना(आरती)कानिटकर's Blog (18)

मैं और मेरा मन

पहन रखा हैं 

मैने गले में, एक

गुलाबी चमक युक्त

बडा सा मोती

जिसकी आभा से दमकता हैं      

मेरा मुखमंडल 

मैं भी घूमती हूँ  इतराती हुई

उसके नभमंडल में…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on June 20, 2019 at 10:00am — 5 Comments

सुबह की धूप

 खुद को भूली वो जब दिन भर के काम निपटा कर अपने आप को बिस्तर पर धकेलती तो आँखें बंद करते ही उसके अंदर का स्व जाग जाता और पूछता " फिर तुम्हारा क्या". उसका एक ही जवाब "मुझे कुछ नहीं चाहिए. कभी ना कभी तो मेरा भी वक्त आएगा. उसे याद है अपने छोटे से घर की…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on January 6, 2018 at 6:45pm — 3 Comments

हस्तरेखा (लघुकथा)

"इतना मान-सम्मान पाने वाली, फिर भी इनकी हथेली खुरदरी और मैली सी क्यों है?"-- हृदय रेखा ने धीरे-धीरे बुदबुदाते हुए दूसरी से पूछा तो हथेली के कान खड़े हो गए।

"बडे साहसी, इनका जीवन उत्साह से भरपूर है,फिर भी देखो ना..." मस्तिष्क रेखा ने फुसफुसा कर ज़बाब दिया।

" देखो ना! मैं भी कितनी ऊर्जा लिए यहाँ हूँ, किंतु हथेली की इस कठोरता और गदंगी से.....!" जीवन रेखा भी कसामसाई।

"अरे! क्यों नाहक क्लेष करती हो तुम तीनों? भाग्य रेखा…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on October 7, 2017 at 4:00pm — 11 Comments

वो दिन---

"तुम रातभर बैचेन थी। हो सके तो आज आराम करो। मैंने चाय बनाकर थर्मस में डाल दी हैं। मैं नाश्ता, खाना आफ़िस में ही ली लूँगा, तुम बस अपना बनवा लेना। आफ़िस से छुट्टी ले लो।"

पास तकिए पर रखे कागज को पढा और चूमकर सीने पर रख लिया। आफ़िस में इस एक दिन के अवकाश की लड़ाई लड़ी और जीती भी थी।

चाय का कप लेकर बालकनी में आई तो सहज ही प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनती उन लड़कियों पर नजर गयी। उफ्फ, ये लोग क्या करती होंगी इन दिनों? कप हाथ में लिए-लिए ही झट नीचे आयी। उन्हें आवाज लगाकर अपने…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on September 25, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

"दो घडी का सुख"

उसने सिला गये बेसन  को थाली में फैलाकर चूल्हे  की गरम राख को थोडा सार कर उस  पर रख दिया था ताकि पसीजन से आई बदबू  खत्म हो जाए. आज पहली बार रमेश्या ने उसे ढाई सौ ग्राम तेल लाकर दिया था घर में. वरना तो वह अपनी सारी कमाई शराब में ही फूक देता था. वह  भी काम से आते वक्त बीबी जी से दो प्याज माँगकर ले आई थी.

बाहर आसमान भी आज उसके घर में खुशी बरसाने के भाव मे था. चाँद का उजाला ना सही इस छोटे से सुख में  घुमडते बादलों सा उसका मन झूम-झूम उठा  था.

"आज ही तो तू आई थी मेरे जीवन में…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 31, 2017 at 7:45pm — 11 Comments

एक पहलू ये भी---

"अरे! सुनंदा सुनो भाई कब से फोन पर बातें कर रही हो. चलो अब खाना लगाओ जी. बडी भूख लगी है. क्या  इतनी लंबी बातें किए जा रही हो." 



"जी! "अंकुर" से. बता रहा आज किसे बिज़नेस …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on June 9, 2017 at 10:45pm — No Comments

संक्रमण--लघुकथा

हैलो.." ट्रीन-ट्रीन की घंटी बजते ही स्नेहा फोन  उठाते हुए बोली

" …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on August 28, 2016 at 3:04pm — 12 Comments

लूली---लघुकथा

 पास ही  की झुग्गी के  बच्चे और यहाँ तक की कुत्ते भी अचानक से उस और दौड़ पडे .

"अरे मुन्ना! वो देख जा जल्दी बहुत सारा खाना आया दिखता है." लूली ने जोर देकर अपने भाई से कहा और …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on August 23, 2016 at 10:00pm — 6 Comments

"विसर्जन" लघुकथा

अखबार हाथ में लेकर सृजन लगभग दौड़ते हुए  घर  मे घुसा

"मम्मा!, पापा! ये देखो ये तो वही है ने जो हमारे गणपति बप्पा को..."…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 23, 2016 at 3:30pm — 12 Comments

"मौन"कुर्सी मायावी है

रणवीर सिंह और अशोक कालकर  दोनो ने गुड़गाँव मे एक साथ  एक मल्टीनेशनल कंपनी ने ज्वाइन किया था । दो भिन्न संस्कृति, मातृभाषा के वे तीसरी तरह की संस्कृति मे रचने-बसने का प्रयत्न करने लगे थे। धीरे-धीरे आपसी मित्रता गहरा गई. ऑफ़िस के …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 21, 2016 at 9:28pm — 4 Comments

रिश्ते की जद्दोजहद

शादी मे सारा कुछ अच्छे से निपट गया थासभी मेहमानों को वापसी उपहार,  मिठाईयो के डिब्बे देकर रुखसत किया गया था। घर को भी फ़िर से सवार कर पटरी पर ले आई थी कि अचानक  एक सुटकेस और …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 15, 2016 at 8:00pm — 2 Comments

"सुराख वाले छप्पर"

ऑफ़िस से आकर सब काम निपटाते -निपटाते थक कर चूर हो गई थी वह. बस! बर्तन जमा कर दूध मे जामन लगाना शेष था.   उसके हाथ तेजी से  प्लेटफार्म साफ़ कर रहे थे.पसीने से …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 5, 2016 at 7:00pm — 8 Comments

केक्टस मे फूल

पड़ोस के गुप्ता आंटी के घर से आती तेज आवाज़ से तन्मय के कदम अचानक बालकनी मे ठिठक गये। अरे! ये आवाज़ तो सौम्या की है …
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Added by नयना(आरती)कानिटकर on March 17, 2016 at 11:30pm — 12 Comments

"बदला"

पुलिस चौकी को कार्यक्रम स्थल मे बदल दिया गया है , सामने  लोगो का मजमा लगा हुआ है | उसे देखने के लिये सब बडे आतुर है । आज वो आत्मसमर्पण करने वाली है प्रदेश के सी.एम के सामने । तभी पीली बत्ती की गाड़ी भांय-भांय कर कार्यक्रम स्थल मे प्रविष्ट होती है । तथाकथित सारे उच्चाधिकारी उन्हे घेरे खड़े है ।

कडे सुरक्षा कवच के बीच अंतत वह अपनी बंदूक उनके चरणों मे रख आत्मसमर्पण कर देती है । अन्य औपचारिकता के बाद कार्यक्रम समाप्ती की घोषणा हो जाती है ।

सभी समाचार पत्रों के कुछ तथाकथित  …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 10, 2015 at 9:26am — 3 Comments

गुजारिश रिश्ते की

कैलेंडर  का पन्ना पलटते ही उसकी नजर तारीख़ पर थम गई। विवाह का दिन उसके आँखो के आगे चलचित्र सा घूम रहा था।.सुशिक्षित खुबसुरत नेहा और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक नीरज की जोडी को देख सब सिर्फ़ वाह-वाह करते रह गये थे.वक्त तेजी से गुज़र रहा था।.

जल्द ही नेहा की झोली मे प्यारे से दो जुडवा बच्चे बेटा नीरव और बेटी निशीता के रुप मे आ गये।.तभी --

वक्त ने अचानक करवट बदली बच्चों के पालन-पोषण मे व्यस्त नेहा खुद  पर व रिश्ते पर इतना ध्यान ना दे पाई । उसके  के हाथ से नीरज मुट्ठी से रेत की तरह फ़िसलता…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 8, 2015 at 1:00pm — No Comments

"आभासी रंग"

"बादल !! देखो कितनी सुन्दर हरियाली , चलो हम कुछ देर यही टहलते है"

वो देखो मानव और प्रकृति भी है .संग नृत्य करेगे.

"बादल ने हवा का हाथ पकडते हुए  गुस्से मे कहा-- चलो!! यहाँ से  धरती माँ की गोद  मे  जहाँ सिर्फ़ प्रकृति बहन ही हो. हम वहा नृत्य करेगे".मानव तो कब का उसे छोड चुका है,बेचारी मेरी प्रकृति बहना…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 5, 2015 at 3:30pm — 2 Comments

"अब लौट चले"

सुरेखा कब से देख रही थी आज माँ-बाबूजी पता नहीं इतना क्या सामान समेट रहे है। बीच मे ही बाबूजी बैंक भी हो आए.एक दो बार उनके कमरे मे झांक भी आयी चाय देने के बहाने मगर पूछ ना पाई।

"माँ-बाबूजी नही दिख रहे ,कहाँ है.?"सुदेश ने पूछा

"अपने कमरे मे आज दिन भर से ना जाने क्या कर रहे है। मैं तो संकोच के मारे पूछ भी नही पा रही.तभी---…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on December 4, 2015 at 7:00pm — 13 Comments

मै और तुम

बिखेरे रंग
प्यार के संग-संग
मै और तुम

बिखेरे हँसी

दोस्तो के संग-संग
मै और तुम

बिखेरे गंध
फूलो के संग-संग
मै और तुम

बिखेरे सुर
कुहू के संग-संग
मै और तुम

बिखेरे शब्द
कलम के संग-संग
मै और तुम

मौलिक अप्रकाशित रचना
नयना(आरती कानिटकर
०१/०९/२०१३

Added by नयना(आरती)कानिटकर on September 1, 2013 at 2:17pm — 7 Comments

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