फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन/फ़ेलान
ओज पर तुझको देखना है मुझे
पत्र में उसने ये लिखा है मुझे
नस्ल-ए-नव से मदद का तालिब हूँ
बुर्ज नफ़रत का तोड़ना है मुझे
क्या कहूँ ,कब मिलेगा मीठा फल
सब्र करना तो आ गया है मुझे
आज तेरे बग़ैर ये जीवन
नर्क जैसा ही लग रहा है मुझे
लाख दुश्वारियाँ हों, जाऊँगा
इश्क़ तेरा बुला रहा है मुझे
नर्म गुफ़्तार से "समर" देखो
आज फिर ज़ैर कर लिया है मुझे
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ओज :- ऊँचाई
नस्ल-ए-नव :- नई नस्ल
बुर्ज :- गुम्बद
गुफ़्तार :- बोलचाल
"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित
Comment
आदरणीय समर साहब, आपकी ग़ज़ल को लेकर सुरूचिपूर्ण भावना सहज ही समझ में आ जाने वाली बात है. आपसे मिल कर यही अहसास होता है कि यह कितनी उत्कट है. ग़ज़ल आपकी रूह में बसती है. आज आपको जितनी आशाएँ ओबीओ से हैं, ओबीओ को भी एक मंच के हिसाब से उतनी ही उम्मीद आप जैसे सदस्य से है. यही अन्योन्याश्रय (अभिन्न) सम्बन्ध किसी रचनाकार को आवश्यक माहौल तो देता ही है, मंच को भी क़ामयाब ऊँचाई देता है.
हाँ, यह ज़रूर है, कि हम सभी प्रशिक्षु हैं, सीख रहे हैं. यह सीखने का दौर हमारी ता ज़िन्दग़ी बना रहे.
आमीन
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