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सांस उनको देख कर के है इधर चलने लगी

2122 - 2122 - 2122 - 212 

सांस उनको देख कर के है इधर चलने लगी

कब मिले वो रोज मुझको आरजू रहने  लगी

.

फ़िक्र में हर दम ये दिल डूबा मुझे अब है लगे

उनको अपना है बनाना सोच ये जगने लगी

.

प्यार की गलियाँ बड़ी बदनाम दुनिया में मगर

क्या करें अपनी तबियत जो अगर सजने लगी

.

आप तो हैं हुस्न की तस्वीर जो अनमोल है

ये करिश्मा देख कर दुनिया भी अब जलने लगी

.

ख़ुद खुदा भी सोच के अब है परेशां हो रहा

के बनाकर आपको क्यूँ है कलम रुकने लगी

.

मुनीश “तन्हा” 9882892447

मौलिक व्  अप्रकाशित

आदरणीय समर कबीर साहिब का दिल से शुक्रिया

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Comment by Madan Mohan saxena on May 6, 2016 at 2:45pm

सांस उनको देख कर के है इधर चलने लगी

कब मिले वो रोज मुझको आरजू रहने लगी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 6, 2016 at 12:10am

आदरणीय मुनीश जी, निवेदन है कि इस ग़ज़ल को थोड़ा और समय दीजिये. बहुत कच्ची ग़ज़ल प्रस्तुत हुई है. मिसरों का सब्द विन्यास अभी समय चाहता है. काफ़िया निर्धारण में सजगता की कमी भी महसूस हो रही है. बहरहाल इस प्रयास पर हार्दिक बधाई.

Comment by Samar kabeer on May 5, 2016 at 2:33pm
जनाब मुनीश तन्हा साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है बधाई स्वीकार करें।

चौथे शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष है और सानी मिसरा बह्र में नहीं है देख लीजियेगा।

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