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इस तरह इक औ नया रिश्ता यहाँ बनता गया

2122  2122  2122  212

इस तरह इक औ नया रिश्ता यहाँ बनता गया

आप हम से ना मिले औ दिल गरां बनता गया

 

दिल से दिल मिलने लगे जब तो जहाँ बनता गया

प्यार से भरपूर रोशन आशियाँ बनता गया

 

मिल फकीरों की दुआ से फायदा ये है हुआ

घर मेरा भी धीरे - धीरे आस्तां बनता गया

 

मैं पलटने जब चला किस्मत तो खाली हाथ था

मेहनत के साथ फिर तो कारवां बनता गया

 

रोज कुछ बाजार से लाने की आदत बन गयी

और फिर तो घर में मेरे खानमाँ बनता गया

 

भीड़ से ख़ुद को अलग दिखने की चाहत में देखो

सनकी अच्छे से बुरा हर दम यहाँ बनता गया

.

मुनीश “तन्हा” 9882892447

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on May 2, 2016 at 6:00pm
आ.मुनीश जी, ग़ज़ल अच्छी बन पड़ी है। बधाइयां आपको!
Comment by Sushil Sarna on April 28, 2016 at 8:13pm

मिल फकीरों की दुआ से फायदा ये है हुआ
घर मेरा भी धीरे - धीरे आस्तां बनता गया

वाह बहुत खूब आदरणीय बड़े ही गहरे अहसास पिरोये हैं आपने अपनी इस ग़ज़ल में ... हार्दिक बधाई सर।

Comment by Shyam Narain Verma on April 28, 2016 at 6:22pm
इस सुंदर रचना के लिये बधाई स्वीकार करें ।
Comment by नादिर ख़ान on April 28, 2016 at 1:00pm

आदरणीय मुनीश जी बढ़िया ग़ज़ल कही आपने  बदलनेऔर मेहनत को किस वज़न में बाँधा  है एकबार और देख लीजिएगा तथा "रोज ही बाजार से कुछ लाने की आदत बन गयी" इस मिसरे की भी तक्तीअ करें उम्दा कोशिश के लिए बधाई आपको.... 

Comment by Ravi Shukla on April 28, 2016 at 12:30pm

आदरणीय मुनीश जी गजल के लिये बधाई स्‍वीकार करें । 

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