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गगन मेरा पिता है और ये धरती है मेरी माँ
मैं जिसमें लोटता रहता हूँ वो मिट्टी है मेरी माँ

कुशलता से सभी रिश्तों के मनकों को पिरोती है
बड़ी ही नर्म और' मजबूत-सी डोरी है मेरी माँ

ज़माने के सभी रिश्तों को पल-भर में भुला दूँ,पर
मैं उसकी कोख से जन्मा, मेरी अपनी है मेरी माँ

फ़िज़ा में गूंजता हर ओर मातम,जब सिसकती है
दहल जाती है पृथ्वी, जब कभी रोती है मेरी माँ

यही कारण है शायद, मैं कभी मंदिर नहीं जाता
मेरी खातिर किसी देवी से भी ऊँची है मेरी माँ

डपटती है,झगड़ती है,कभी नाराज़ हो जाती
मगर इक बूँद आँसू से पिघल जाती है मेरी माँ

ये उसकी मेह्रबानी है,कि है दुनिया मेरी रौशन
भले मैं लौ हूँ दीपक का,मगर बाती है मेरी माँ
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(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by जयनित कुमार मेहता on May 12, 2016 at 6:47am
आदरणीय शेख साहब, आदरणीय समर कबीर जी,आदरणीय मदन मोहन जी, आपलोगो की उपस्थिति व प्रोत्साहन से हार्दिक प्रसन्नता हुई। बहुत बहुत आभारी हूँ आपलोगों का!!
Comment by Madan Mohan saxena on May 10, 2016 at 5:38pm

अच्छी ग़ज़ल

बदलते बक्त में मुझको दिखे बदले हुए चेहरे
माँ का एक सा चेहरा , मेरे मन में पसर जाता

नहीं देखा खुदा को है ना ईश्वर से मिला मैं हुँ
मुझे माँ के ही चेहरे मेँ खुदा यारों नजर आता

मुश्किल से निकल आता, करता याद जब माँ को
माँ कितनी दूर हो फ़िर भी दुआओं में असर आता

उम्र गुजरी ,जहाँ देखा, लिया है स्वाद बहुतेरा
माँ के हाथ का खाना ही मेरे मन में उतर पाता

खुदा तो आ नहीं सकता ,हर एक के तो बचपन में
माँ की पूज ममता से अपना जीबन , ये संभर जाता

जो माँ की कद्र ना करते ,नहीं अहसास उनको है
क्या खोया है जीबन में, समय उनका ठहर जाता

मदन मोहन सक्सेना

Comment by Samar kabeer on May 8, 2016 at 5:53pm
जनाब जयनित कुमार जी आदाब,माँ को समर्पित बहुत अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Samar kabeer on May 8, 2016 at 5:50pm
जनाब जयनित कुमार जी आदाब,माँ को समर्पित बहुत अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ा आपने मंच को,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 8, 2016 at 9:56am
हर दिल की बात कहेगा,वो ये ग़ज़ल गायेगा, लाडला अपनी माँ का पहचाना जायेगा,.... तहे दिल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय जयनित कुमार मेहता जी इस प्रेरक सारगर्भित ग़ज़ल की पेशकश के लिए।

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