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टू इन वन (लघुकथा)राहिला

"बड़ी जटिल समस्या में फंस गये हो भई! "
"ये आप क्या कह रहें हैं बाबा! हम तो बड़ी आस लेकर आये हैं आपके पास, देखिये कल रात कैसी लाल नीली पीठ कर दी इसने!"
"अरे ब्याहनें एक गये और दो-दो ब्याह के लाओगे तो और क्या होगा? "
"दो -दो मतलब? "
"मतलब ये दूल्हे राजा!कि ये जो दीख रही है ना, ये तो तू जान के ले आया और जो तेरा ये हाल कर रही है वो तो अनजाने में तुझसे बंध गई। "
"मतलब? "जितना उसकी समझ में आया उससे, उसके पसीने छूट गये ।
"मतलब, मतलब ना कर छोरा !ये जो दूजी है किसी से धोखा खाई बैठी थी मन में ब्याह की इच्छा लिये ,और अपने ही हाथों ईहलीला समाप्त कर ली। ऐन फेरो के वक्त कल्याणी के दुल्हन स्वरूप पर रीझ कर जा घुसी अंदर और भांवरे पड़ गईं।"
"अब क्या होगा बाबा? "
"देख छोरा! भांवरे ना पड़ी होती तो मैं कुछ कर पाता, ये तो सात जन्म ना छोड़ेगी।"
"कुछ तो उपाय होगा महाराज!वरना रोज,रोज कुटने से तो अच्छा फंदा लगा लूं । "
"ना छोरा!ऐसा ना सोच, एक उपाय है अगर तू समझदारी दिखावे तो?"
"बोलो महाराज! मैं सब उपाय करूंगा।"
"तो सुन तू भूल जा तेरा ब्याह कल्याणी से हुआ क्योंकि ये तो तेरा कुछ ना बिगाड़ सके।लेकिन जो तेरा हुलिया बिगाड़ सके है, उसे याद रख । उसी से बात कर, उसी को चाह ।कुछ समझा? "
"नहीं...!"वो सिर खुजाता हुआ बोला । "
"अच्छा ये बता ये कौन है?"वो दुल्हन की ओर इशारा करते हुये बोला । "
"कल्याणी, मेरी जोरू। "
"ना. ..ये लछिया है।"
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Rahila on June 2, 2016 at 10:35am

आप से पहली बार हौसला पा रही हूं आदरणीय शर्मा सर जी! बहुत, बहुत आभार । सादर नमन । 

Comment by Rahila on June 2, 2016 at 10:33am

बहुत शुक्रिया आदरणीय पंकज सर जी!आपको रचना पर उपस्थित देखकर बहुत खुशी हुई ।आपको रचना पसंद आई बहुत आभार । सादर नमन 

Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on May 30, 2016 at 10:23pm

वाह वाह ..................आदरणीया नमन आपको 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 29, 2016 at 9:34am
प्रीत रीत तुम निभा न पाये
माना कुछ मज़बूरी है।
किन्तु हृदय में पास उसे रख
जिससे तेरी दूरी है।
तन को छोड़ गयी है लेकिन
लछिया का मन यहीं अभी।
कल्याणी में उसे देख बस
अब इतना तो ज़रूरी है।।

क्या बात है, खूब लिखा, कहानी ने प्रेम के महसूस किये जाने वले पक्ष को चित्रित किया है।

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