For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल - मुहब्बत करने वाला क्यूँ कभी तनहा नहीं मिलता

मफ़ाईलुन/मफ़ाईलुन/मफ़ाईलुन/मफ़ाईलुन

किसी को भी यहाँ पे क्यूँ कोई अपना नहीं मिलता
तुम्हें तुम सा नहीं मिलता, हमें हम सा नहीं मिलता

ज़माना घूम के बैठे, दुआएँ कर के भी देखीं
हमें तो यार कोई भी कहीं तुम सा नहीं मिलता

ज़मीनें एक थीं फिर भी लकीरें खींच दीं हमने
सभी से इसलिए भी दिल यहाँ सबका नहीं मिलता

वहाँ पे बैठ के साहब लिखे तक़दीर वो सबकी
लिखावट एक जैसी है तो क्यूँ लिक्खा नहीं मिलता

वो जब से शहर से लौटा यही इक बात कहता है
वहाँ मुर्दे तो मिलते हैं मगर ज़िन्दा नहीं मिलता

रहे ग़र याद ये तुमसे तो इसको याद कर लेना
समन्दर फिर भी मिलते हैं मगर दरिया नहीं मिलता

तड़पना, मुस्कुराना, यार रोना और खो जाना
मुहब्बत करने वाला क्यूँ कभी तनहा नहीं मिलता

मुक़द्दर इक बहाना था, न जाने क्या बचाना था
अगर हम ठान लेते तो यहाँ पे क्या नहीं मिलता

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 543

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mahendra Kumar on July 4, 2016 at 7:41pm
बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि सर, सादर!
Comment by Ravi Shukla on July 4, 2016 at 2:45pm

आदरणीय महेद्र जी बढि़या गजल के लिये बधाई स्‍वीकार करें 

मुहब्बत करनेवाला क्यों कभी तन्हा नहीं मिलता  बढि़या बात कही है आपने । 

Comment by Mahendra Kumar on July 3, 2016 at 1:31pm
हार्दिक आभार आदरणीय शिज्जु सर, सादर!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 3, 2016 at 8:43am
/मुहब्बत करनेवाला क्यों कभी तन्हा नहीं मिलता/ वाह क्या खूब कहा। बहुत बहुत बधाई आपको
Comment by Mahendra Kumar on July 2, 2016 at 11:07pm

आदरणीय गिरिराज सर, आपको ग़ज़ल अच्छी लगी इसके लिए आपका हृदय से धन्यवाद! जिस मिसरे का आपने ज़िक्र किया है वहाँ उम्मीद की बात कहाँ से आ गयी यह मुझे समझ नहीं आया। यदि आप इसे स्पष्ट कर सकें तो बेहतर होगा। हाँ, आपका सुझाव निश्चित ही बहुत अच्छा है क्योंकि 'मुर्दे' शब्द का प्रयोग मुझे खटक-सा रहा था। आप द्वारा दिया गया संशोधित मिसरा मुझे बेहद पसन्द आया। इसके लिये आपको हृदय से आभार, सादर!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 2, 2016 at 9:24pm

अ० महेंद्र जी  बढ़िया गजल हुयी है . आपकी फोटो बिलकुल बच्चे जैसी लगती है पर आप् बच्चे हैं नहीं तो ठीक फोटो लगायें ना . सादर .


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 2, 2016 at 6:10pm

आदरनीय महेन्द्र भाई , लाजवाब गज़ल हुई है , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ।

तार्किकता के लिहाज़ से एक शे र मे परिवर्तन की ज़रूरत लग रही है --

वो जब से शहर से लौटा यही इक बात कहता है
वहाँ मुर्दे तो मिलते हैं मगर ज़िन्दा नहीं मिलता    ---  मुर्दे आपने जब कह ही दिया तो ज़िन्दा रहने की उम्मीद क्यों ?

ऐसे कह के देखिये , अगर सही लगे तो ---

वो जब से शहर से लौटा यही इक बात कहता है
वहाँ पर आदमी तो है, मगर ज़िन्दा नहीं मिलता  -- या और जो कुछ आप चाहें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"करे  मरम्मत  चप्पल  जूते । चलता  जीवन  इसके बूते।।दोजून कभी खा लेता काके।…"
45 minutes ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"   आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, सादर नमस्कार, प्रदत्त चित्र पर आपने सुन्दर…"
8 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई * बन्द शटर हैं  खुला न ताला।। दृश्य सुबह का दिखे निराला।।   रूप  मनोहर …"
13 hours ago
Chetan Prakash replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"शुभ प्रभात,  आदरणीय! चौपाई छंद:  भेदभाव सच सदा न होता  वर्ग- भेद कभी सच न…"
18 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद +++++++++ करे मरम्मत जूते चप्पल। काम नित्य का यही आजकल॥ कटे फटे सब को सीता है। सदा…"
18 hours ago
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
yesterday
Admin posted discussions
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूसबिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।घास घूस…See More
Wednesday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यारप्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।आपस का विश्वास ही, इसका है आधार…See More
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ. भाई चेतन जी, उत्साहवर्धन व स्नेह के लिए आभार।"
Feb 15
Sushil Sarna replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Feb 15
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-183
"आ.लक्ष्मणसिह धानी, 'मुसाफिर' साहब  खूबसूरत विषयान्तर ग़ज़ल हुई  ! हार्दिक …"
Feb 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service