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गजल( काफियों की अब करो......)

2122 2122 2122
काफियों की अब करो पहचान फिर से
पानी बहता मत करो हिमवान फिर से।1

ढ़ल रहा कबसे घड़ा में बेझिझक वह
अब अतल से तो मिले नादान फिर से।2

आज निर्मल बह रहा कहता धरा पर
प्यास बुझती हो यही अरमान फिर से।3

मैल मन का धो रही उसकी लहर है
मत सुनाओ अब गड़ा फरमान फिर से।4

काफिये का जल बँधेगा कब हदों में ?
तूमरी में मत उठा तूफान फिर से।5

आब कह दो या कहो पानी इसे तुम
फर्क कितना है कहो गुणवान फिर से।6

बात मन की कह रहे हैं काफिये ही
वर्ण बनते हर्फ की आख्यान फिर से।7

चाँद-सूरज कब बँटे हैं,तोलना है,
राह मुश्किल क्यूँ करें नुख्तान फिर से।8

भाव ढ़ोतीं मौन भाषाएँ मुसाफिर
हो भला आओ करें संग्यान फिर से।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on July 14, 2016 at 8:22pm
आदरणीय सुशील जी,आपका आभार।
Comment by Manan Kumar singh on July 14, 2016 at 8:21pm
आभार आपका आदरणीय गिरिराज भाई।
Comment by Sushil Sarna on July 14, 2016 at 2:49pm

आदरणीय मनन जी काफियों पर आधारित इस सुंदर  ग़ज़ल  के लिए हार्दिक बधाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 14, 2016 at 11:47am

आदरनीय मनन भाई , अच्छी गज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ आपको , इस गज़ल के लिये ।

Comment by Manan Kumar singh on July 13, 2016 at 4:05pm
जनाब समर साहब गजल आपकी तवज्जो के काबिल ठहरी,यह मुझ अदना तुकबंद के लिए हौसलातुल्य है।'हिमवान' हिमालय पर्वत को कहते हैं यानि बर्फ का घर।शेष परिमार्जन मैं अभी करता हूँ।आपकी बहुत-बहुत शुक्रिया पेश है।
Comment by Samar kabeer on July 13, 2016 at 3:51pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई है, पूरी ग़ज़ल काफियों के बारे में है, बहुत बधाई आपको इस प्रस्तुति के लिये, हिंदी शब्दों का मुझे ज्ञान कम है, कृपा कर "हिमवान' का अर्थ मुझे बताएं ।

छटे शैर के ऊला मिसरे का अंतिम शब्द 'मुकम्मल'भर्ती का है, इसकी जगह 'इसे तुम' करना मुनासिब होगा ।

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