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मुक्तिका: तुम क्या जानो ---- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

तुम क्या जानो

संजीव 'सलिल'

*

तुम क्या जानो कितना सुख है दर्दों की पहुनाई में.

नाम हुआ करता आशिक का गली-गली रुसवाई में..

 

उषा और संझा की लाली अनायास ही साथ मिली.

कली कमल की खिली-अधखिली नैनों में, अंगड़ाई में..

 

चने चबाते थे लोहे के, किन्तु न अब वे दाँत रहे.

कहे बुढ़ापा किससे क्या-क्या कर गुजरा तरुणाई में..

 

सरस परस दोहों-गीतों का सुकूं जान को देता है.

चैन रूह को मिलते देखा गजलों में, रूबाई में..

 

'सलिल' उजाला सभी चाहते, लेकिन वह खलता भी है.

तृषित पथिक को राहत मिलती अमराई - परछाँई में

 

***************

 

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Comment

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Comment by sanjiv verma 'salil' on May 12, 2011 at 3:45pm
संत और बिच्छू दोनों ही. निज स्वभाव को नहीं तजें.
यह बचाए वह काटे, ज्यों निष्ठा चाहे हरजाई में..

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 12, 2011 at 12:05am

सही कहा गुरुवर तभी तो पड़े-पड़े लें गंगा गोता 

झरझर पीपल छाँहीं ऊपर,  कुम्हलायें चरपाई में

Comment by sanjiv verma 'salil' on May 10, 2011 at 8:50pm
सौरभ शतदल का पाकर ही सार्थक होता है जीना.
नेह नर्मदा नहा 'सलिल' ने सच पाया गहराई में..

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 10, 2011 at 4:16pm

//सरस परस दोहों-गीतों का सुकूं जान को देता है.

चैन रूह को मिलते देखा गजलों में, रूबाई में..//

 

आचार्यवर,

वही छाँव है, वही उजाला जो तुमने स्पर्श किया है

छूदो मुझको मैं भी जीलूँ अलकों की अमराई में..

Comment by sanjiv verma 'salil' on May 10, 2011 at 2:33pm
आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद. आपको रुचा तो मेरा कविकर्म सफल हुआ.

धीरज धरकर संजय बागी बना नहीं वीरेंद्र हुआ.
अभिनव अचल प्रकाश बिखेरे ऊषा की अरुणाई में..
Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on May 10, 2011 at 1:58pm
बहुत ही अच्छी रचना संजीव जी.
Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on May 10, 2011 at 1:58pm
बहुत ही अच्छी रचना संजीव जी.
Comment by Abhinav Arun on May 10, 2011 at 1:16pm
pranaam aachary jee behad sanjeeda khayalon kee rachna waah-
सरस परस दोहों-गीतों का सुकूं जान को देता है.

चैन रूह को मिलते देखा गजलों में, रूबाई में..

waah prabhaav purn.
Comment by Veerendra Jain on May 10, 2011 at 12:43pm

उषा और संझा की लाली अनायास ही साथ मिली.

कली कमल की खिली-अधखिली नैनों में, अंगड़ाई में..

 

aacharya ji...bahut bahut dhanyawad...aapka..itni achi rachna padhne ko mili...evm hardik badhai...

Comment by Dheeraj on May 10, 2011 at 12:32pm

चने चबाते थे लोहे के, किन्तु न अब वे दाँत रहे.

कहे बुढ़ापा किससे क्या-क्या कर गुजरा तरुणाई में..

 

.....................बहुत ही प्रिय और सहज ढंग से भावनाओ को पिरो कर यथार्थ दिखाई है ..... बहुत ही अच्छी रचना संजीव जी.
.......भाव स्वीकार करे

 

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