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बहुत दिनों के बाद मैंने यह डायरी खोली है ........

नव गीत
बहुत दिनों के बाद
मैंने यह डायरी खोली है।

आज नहीं है तू ओ! सजनी
मैं हूं सागर के बिन तरणी
पंछी बन कैदी हूं घर में
खड़ी हुई ज्यों रेल सफर में

बहुत दिनों के बाद
तेरी यह डायरी खोली है।

पढ़ लेता मैं डायरी पहले
कह देता जो चाहे कहले
घुट घुट के न रोने देता
कहा हुआ सब तेरा करता

बहुत दिनों के बाद
मर्म यह डायरी खोली है|

पता चला है आज ही मुझको
कितनी बेचैनी  थी तुझको
तभी तो तूने कदम उठाया
आत्म हत्या को जाल लगाया

बहुत दिनों के बाद
राज़ यह डायरी खोली है

एक बार बस कहा तो होता
रंजिश थी गर बताया होता
मैं समझा था कह दोगी तुम
रूठी ना रह पाओगी तुम

बहुत दिनों के बाद
बात यह डायरी खोली है|

पछतावे में हर दिन रहता
मन की बात दबाये रहता
उन अनजानी यादों का डेरा
घेर रहा है हर पल मेरा
बहुत दिनों के बाद
परत यह डायरी खोली है


............................आभा

प्रस्तुत नवगीत मौलिक एवं अप्रकाशित है 

Views: 637

Comment

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Comment by pratibha pande on July 28, 2016 at 10:21pm

सुन्दर नवगीत ,हार्दिक बधाई आपको आदरणीया आभा जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 27, 2016 at 9:29pm

अच्छी प्रस्तुति आद० आभा जी बहुत बहुत बधाई  

Comment by Abha saxena Doonwi on July 27, 2016 at 9:10pm

आदरणीय Shyam Narain Verma जी  आपकी प्रतिक्रिया  मेरे लिए एक संबल का  कार्य करती है ...बहुत बहुत आभार आपका ...नमन ..    :)

Comment by Shyam Narain Verma on July 27, 2016 at 4:05pm
आपकी इस सुंदर प्रस्तुति पर सादर बधाई

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