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लघु कथा राखी वाला नोट

लघु कथा

राखी वाला नोट
जैसे ही चौराहे  पर लाल रंग का सिगनल हुआ वह अपनी बहन लाली को गोदी में ले कर दौड़ पड़ा भीख माँगने के लिये। बन्द कारों के शीशों के पार उसकी आवाज पँहुच नहीं पा रही थी।
तभी एक कार का शीशा खुला और एक महिला ने पचास रूपये का नोट उसे पकड़ा दिया। लाली को उसने नीचे बिठाया और वह उस पचास रूपये के नोट को निहारने लगा। ’’ भैया वह देखो कितनी सुन्दर राखियाँ सामने दुकान पर टगीं हैं एक राखी मुझे भी चाहिये’’
भाई उठा और राखी लेने के लिये दौड़ पड़ा। अचानक चूूूू.......... की आवाज हुयी ..........और कुछ देर बाद वह खून से लथपथ नीचे जमीन पर पड़ा तड़प रहा था। हाथ में उसके वही पचास रूपये का नोट खून से तर व तर होता जा रहा था। लाली को तो मालूम भी नहीं था कि अब उसका भाई राखी ले कर अब कभी भी वापिस नहीं आयेगा।
.........आभा

अप्रकाशित एवं मौलिक 

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Comment by Ashok Kumar Raktale on August 22, 2016 at 10:14pm

वाह ! उत्साह में लापरवाह होना कितना घातक होता है. यह बताती सुंदर लघुकथा. बहुत-बहुत बधाई.

Comment by Abha saxena Doonwi on August 22, 2016 at 10:09pm

आदरणीय Jawahar Lal Singh जी  नमस्कार , हो सकता है आपको अंत ठीक न  लगा  हो  ...परन्तु जो  मेरे मन की   भावनाओं ने कहा वही लिखा ..आपका बहुत  बहुत  शुक्रिया ..

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 22, 2016 at 6:43pm

आदरणीया आभा जी, मर्मान्तक दुखांत कर दिया आपने ... थोड़ी सकारात्मकता होनी चाहिए थी. अन्य सुविज्ञ जन अपनी राय रक्खें! 

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