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ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )

ग़ज़ल ( जश्ने आज़ादी )
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शिकवे गिले भुलाकर उल्फत को हम बढ़ाएं ।
मिल जुल के आओ जश्ने आज़ादी हम मनाएं ।

तोड़ें न मंदिरों को मस्जिद नहीं गिराएं ।
माहौल एकता का हम देश में बनायें ।

क़ुर्बानियों से जिनकी आज़ाद हम हुए हैं
हम उनके हक़ में आओ दस्ते दुआ उठायें ।

उल्फत से हम रहेंगे झगड़ा नहीं करेंगे
क़ौमी निशाँ के नीचे आओ क़सम ये खाएं।

गैरों ने जिस अदा से अपने वतन को लूटा
अपनों को भा गयी हैं शायद वही अदाएं ।

बस मेरी रहबरों से इतनी सी है गुज़ारिश
मज़हब की आड़ लेकर दंगे नहीं कराएं ।

इंसानियत के नाते हम सब हैं भाई भाई
तस्दीक़ कब है ज़ेबा बाहम लहू बहाएं ।

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by गिरिराज भंडारी on August 16, 2016 at 4:55pm

आदरनीय तस्दीक भाई , खूबसूरत संदेश देती आपकी गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ । और इन भावों के लिये ' आमीन ' तो कहना की पड़ेगा ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 16, 2016 at 6:40am
इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिये हार्दिक बधाई आदरणीय ।

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