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गजल (पुरस्कारों को इंगित) (मनन)

2122 2122 2122 2


मर रहे क्यूँ नाम के अखबार की खातिर
कब बने तमगे कहो फनकार की खातिर।1

लिख रहे जो बात कुछ भी काम आये तो
गर बहें आँसू किसी दरकार की खातिर।2

चाँद-सूरज जल रहे फिर मोम गलती है,
रूठते हैं कब भला उपहार की खातिर।3

बाढ़ आती है जहाँ कुछ- कुछ पनपता है
है कहाँ सब लाजिमी घर-बार की खातिर।4

खुद खुशी हित थी लिखी बहु जन मिताई ही
लिख रहे कुछ लोग निज उपकार की खातिर।5

शोखियों का शौक रखते बदगुमां कुछ हैं
कौन मरता है यहाँ आभार की खातिर।6

छेंकते कागज सियाही भी बिदकती है
लिख रहे आतुर मुए 'सरकार' की खातिर।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Samar kabeer on August 23, 2016 at 10:50pm
आपके सलाम के जवाब में बहुत सी दुआएं,हमेशा ख़ुश रहिये,'असातज़ा'मतलब उस्ताद शायर ।
Comment by Manan Kumar singh on August 23, 2016 at 7:29pm
अा.समर साहब,मेरा सलाम कबूल फरमायें।
Comment by Manan Kumar singh on August 23, 2016 at 7:27pm
आभार आदरणीय समर साहब,आपकी सलाह हमेशा माकूल हुआ करती है।वैसे 'असातजा' का मतलब मैं नहीं समझ पाया,सादर।
Comment by Samar kabeer on August 23, 2016 at 6:17pm
जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल अच्छी हुई मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
अभ्यास करते समय हमेशा रवां बहरों का इंतिख़ाब करना चाहिए,अल्फ़ाज़ की बंदिश का भी खयाल रखना चाहिए,अपनी बनाई हुई ज़मीनों से पहले असातज़ा की बनाई हुई ज़मीनों पर अभ्यास कीजिये,आपके फ़न पर निखार आजायेगा,उसके बाद अपनी बनाई हुई ज़मीनों में ग़ज़ल का नम्बर आएगा,उम्मीद है आप मेरा इशारा समझ गए होंगे ।
Comment by Manan Kumar singh on August 23, 2016 at 1:43pm
आदरणीय गिरिराज भाई, आपका बहुत बहुत आभार! आपकी हैसला आफजाई और प्रेरणा का कायल हूँ।देखता हूँ कि और क्या किया जा सकता है,नमन!
Comment by Manan Kumar singh on August 23, 2016 at 1:38pm
आभार आपका आ.सुरेश जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 23, 2016 at 12:34pm

आदरणीय मनन भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , आपको हार्दिक बधाइयाँ गज़ल के लिये । मिसरों के राबते पर और समय देना चाहिये था ऐसा लगता है , देखियेगा अगर कुछ बात बन सके तो , कुछ ख़टक रहा है लेकिन कोई क्या ख़टक रहा है पूछे अगर तो मै बताने मे असमर्थ हूँ ।

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 23, 2016 at 10:53am
चाँद सूरज जल रहे फिर मोम गलती है
रूठते हैं कब भला उपहार की खातिर।
वाह! आदरणीय बहुत खूब। बधाई स्वीकार करें ।

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