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आकाश ,बादल, चाँद, सितारे
लगते है कितने प्यारे प्यारे
बच्चों की कहानियों में आते
युवा के मन को यह है भाते
सुबह और शाम
दिन और रात
चार पहर की चार बाते
चार बातों की चार सौगातें
पेड़ पौधों की अपनी महफ़िल
परिंदों के अपने कलरव
रेंगते कीड़ों की अपनी वाणी
धरा की बढती खूबसूरती
आकाश को महकाती
क्षितिज देखता चहु और से
नदी सागर का बहना
चट्टानों से बहते झरनें
चमकते पत्थर
सूखे पठार
चुभते काँटे
मिट्ठी मीट्टी की मिठास
घोलती रहती
घुलती रहती
निरंतर अपनी अपनी जगह ।
बनता है कैसा
एक खूबसूरत जहां

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2016 at 4:02pm
धन्यवाद Dr Ashutosh Mishra ji
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 25, 2016 at 3:43pm

आदरणीया कल्पना जी प्रकृति के सौंदर्य को चित्रित करती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2016 at 10:22am
धन्यवाद आदरणीय ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2016 at 9:38am

आदरनीया कल्पना जी , सब कुछ मिला के ही जहाँ सुन्दर बनता है , हर रंग ज़रूरी है । बहुत खूब , हार्दिक बधाइयाँ रचना के लिये ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 23, 2016 at 6:02pm
धन्यवाद आदरणीय जवाहर लाल जी
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 23, 2016 at 6:02pm
धन्यवाद आदरणीय सुरेश कुमार जी ।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 23, 2016 at 5:51pm

जी आदरणीया कल्पना भट्ट जी, प्रकृति कितनी सुन्दर है! और सुन्दर है यह जहाँ हर दृष्टिकोण से बहुत ही सुन्दर वर्णन! सादर!

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 23, 2016 at 10:55am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है खूबसूरत जहां का।बधाई प्रेषित है ।

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