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ऐसा भी हो 
स्वंय से मिले निगाहें जब- जब 
गर्व से सीना तन पाए 
ग्लानि  हो न मीलों  तक 
इतिहास भले न रच पाए 
किसी अधर पर नहीं न सही 
निज के अधरों पर नाम हो 
किसी गैर को नहीं न सही 
स्वंय को स्वंय से  काम हो 
निज के अधर पुकारें  जब -जब 
निज का नाम उच्चारें जब -जब 
स्वंय को सुनने की  क्षमता हो 
रग -रग में रंग  उबलता    हो 
स्वंय को हर पल तोले तो 
वाक्  उचित  सा  बोले तो 
हाथ पावों  को साथ साथ ले  
भाग्य  की गठरी    खोले तो 
कबीर बनें या न बन पाएं 
कुछ तो सच सा कह पाए 
या बन जाएँ वेणू  वीणा 
किसी अधर पर  सज जाएँ। .. 
अमिता  तिवारी 
 
मौलिक  एव अप्रकाशित

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Comment

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Comment by amita tiwari on September 14, 2016 at 9:26pm

आ० सुरेश जी ,राम शिरोमणि जी 

आभार 

सादर  अमिता 

Comment by ram shiromani pathak on September 14, 2016 at 8:37pm
सुन्दर प्रस्तुति।प्रयासरत रहे ।शुभ शुभ
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 14, 2016 at 8:23pm
आदरणीया अमिता तिवारी जी बहुत सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई प्रेषित है । सादर ।
Comment by amita tiwari on September 14, 2016 at 8:11pm

शुक्रिया  जनाब कबीर साहिब 

Comment by Samar kabeer on September 14, 2016 at 11:58am
मोहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब,बहुत अच्छी लगी आपकी कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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