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मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने

मेरे चेहरे पर है जमाने के पहरे कितने
मै हँसूंगा तो उतर जाएंगे चेहरे कितने

मेरी जफाओं का रोना रोते हो बहोत
तुम अपनी वफाओं मे ठहरे कितने

आस्मा अपनी उसत लिए ठहरा है
है समंदर तुम्हारे गहरे कितने

काम थोडा कर लेते है लेकिन
लोग सजा लेते है सहरे कितने

मोहब्बत का पैगा़म सुनाना है मुझे
देखिए तो ये लोग है बहरे कितने

ताबिर जो बतलाते है आज ख़्वाबों कि
बता नही सक्ते दरपेश है ख़तरे कितने

ये तो अपनी नज़र तय करेगी "हमदर्द"
ख्वाब सियाह कितने ,सुनहरे कितने

"मौलिक व अप्रकाशित"
अज़िम शेख़ "हमदर्द" लातुर.
मो. नं.+91-9673086786



"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Azeem Shaikh on October 6, 2016 at 1:38am
सभी उस्ताद हज़रात का तहेदिल से शुक्रिया
ना तो मै कोई बेहतर शायर हुं नाही मै शायरी के ऊसुल (नियम) जानता हुं
मै तो ऐसेही काफिए से काफिया मिलाता हुं

आज आप ने मेरा हौंसला अफ्जाई कि मै बहोत ख़ुश हुं

आईंदा मै और अच्छे कलाम पेश करुंगा
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 27, 2016 at 9:12am
आदरणीय अजीम शेख साहब आपकी रचना बहुत अच्छी है।सादर बधाई प्रेषित है ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 26, 2016 at 4:27pm
बहुत बढ़िया पेशकश के लिए सादर हार्दिक मुबारकबाद मोहतरम जनाब अज़ीम शैख़ साहब। कुछ टंकण त्रुटियों पर ग़ौर फ़रमाइयेगा, जैसे हसुंगा= हँसूंगा ...

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 26, 2016 at 3:39pm

आ. आज़िम शेख साहब अच्छी नज़्म है बधाई

Comment by आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' on September 26, 2016 at 2:07pm

आ. जनाब अज़िम शेख़ "हमदर्द" जी !!!
सुन्दर प्रस्तुति के लिये दाद और मुबारक़बाद कबूल करें!!!
मुझे ये सब शेर बड़े पसंद आये !!!

काम थोडा कर लेते है लेकिन
लोग सजा लेते है सहरे कितने

मोहब्बत का पैगा़म सुनाना है मुझे
देखिए तो ये लोग है बहरे कितने

ये तो अपनी नज़र तय करेगी "हमदर्द"
ख्वाब सियाह कितने ,सुनहरे कितने

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