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उमड़ते घुमड़ते
रहे एहसास
उन लहरों की तरह
आकाश से सागर तक
फ़ासले तय करते गये
हर हवा के झोंके
ने पत्तों की उड़ाया कभी
टकराये पेड़ से
चट्टानों से
बहे झरने की तरह कभी
तिनके की तरह तैरते रहे
पानी में अपने अस्तित्व
के लिए लड़ते रहे
उन लहरों से ।

कभी हवा से उड़ने लगे
एक पतंग बन
खुले नभ में
अपने ख्वाबों को
उंचाईयों पर पहुँचाने के लिए
हंसते हुए लहराते हुए ।

बरस पड़े आँसू बन कभी
अपनी यादों के सहारे
घुटते रहे
कभी टूटते रहे
बिखरते रहे
सिमट ते रहे ।

सोचा कि मर जातें हैं
यह एहसास भी
पर बादल में
अपने आकार बदलते रहे ।


मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by Nita Kasar on November 18, 2016 at 7:55pm
बढ़िया कविता लिखी है आपने आद०कल्पना भट्ट जी ,बादलों को प्रतीकात्मक आधार बनाकर ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 17, 2016 at 4:24pm
धन्यवाद आदरणीय
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 15, 2016 at 8:35pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट जी बहुत ही सुन्दर कविता लिखी है आपने । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । सादर ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 13, 2016 at 3:15pm
आदाब जनाब समर साहब । आपको यह कविता पसंद आई सार्थक हुआ यह प्रयास । दिल से शुक्रिया सर ।
Comment by Samar kabeer on October 13, 2016 at 2:43pm
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,ये कविता भी बहुत सुंदर लिखी आपने,दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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