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अभी आई है पतझड़ ये बहार कभी तो आएगी(गजल)/सतविन्द्र कुमार राणा

1222 1222 1222 1222

अभी आई है पतझड़ ये बहार कभी तो आएगी
खिलेंगे फूल खुशियों के सुकूँ देकर ही जाएगी।

जुदाई सह नहीं पाया हुआ था दर्द सीने में
उसे ही याद है रक्खा वही जीना सिखाएगी।

जो जोड़ी चोर ने दौलत नहीं कुछ काम है आई
छुपाने की रही कौशिश दिखाई तो फ़ँसाएगी।

बड़े अरमान से चाहा, जिसे पूजा,जिसे माना
नहीं यह जान पाए थे वही हमको सताएगी।

लगाया जोर था जिसको बड़ी ऊपर ले जाने में
नहीं अच्छी बनी सीढ़ी तुझे नीचे गिराएगी।

रखेगा गर करम मालिक तेरे ऊपर सही राणा
कलम तेरी तुझे हरदम सही लिखना सिखाएगी।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 11:31pm
आदरणीय मिथिलेश जी सादर नमन!प्रोत्साहन और स्नेह यूँ ही बना रहे,साथ ही मार्गदर्शन भी सदैव वांछित है।सादर हारदिक आभार!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 4, 2016 at 11:29pm
आआदरणीय गिरिराज सर सादर नमन!12112=1222 नहीं लिया जा सकता!आपका आशय समझ पा रहा हूँ।मार्गदर्शन के लिए कोटि कोटि आभार!मैं इस भूल को सुधारने का समुचित प्रयास करूंगा सादर!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 22, 2016 at 11:54pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, ग़ज़ल पर बढ़िया प्रयास हुआ है. हार्दिक बधाई. आदरणीय गिरिराज सर का मार्गदर्शन मिल ही गया है. अभ्यास के क्रम में कहन भी प्रभावकारी होती जाएगी. सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 22, 2016 at 12:33pm

आदरणीय सतविन्द्र भाई , गज़ल अच्छी कही है , हार्दिक बधाइयाँ ।  आदरनीय मतले का उला , तीसरे रुकन से बेबहर है

अभी आई/ है पतझड़ ये/ बहार कभी/   तो आएगी    --- देख लीजियेगा ।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 21, 2016 at 2:02pm
अनुमोदन के लिए बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र नाथ भाई जी
Comment by नाथ सोनांचली on November 21, 2016 at 5:48am
बहुत खुबसूरत गजल, दिली दाद कबूल फरमायें
Comment by नाथ सोनांचली on November 21, 2016 at 5:47am
आदरणीय सतविन्द्र जी सादर अभिवादन...
जुदाई सह नही पाया हुवा था दर्द सीने में
उसे ही याद रख्खा वही जीना सिखाएगी.......

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