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2122 2122 2122 212
प्यार करते हो हमें गर, साथ चलकर देखना।
जल रहे जिस आग में हम, तुम भी जलकर देखना।।

एक गठरी बांधकर, मैंने सवालों की रखी।
दिल में आ जाए कभी, दो एक हल कर देखना।।

रास्ता बाहर का दिखलायेंगे अपने, आपको।
है अगर साहस तो लहरों सा, मचलकर देखना।।

हूँ मैं सोना आग में जलना, ही मेरा काम है।
दर्द मेरा जान जाओगे, पिघलकर देखना।।

जागता है साथ मेरे, ये बिछौना रातभर।
चाहती हूँ एक दिन इसको, बदलकर देखना।।

सामने से देखता तो है नहीं, मुझको कभी।
जान जाती हूँ मैं उसका आँख छलकर देखना।।

नर्म अहसासों की खुशबु, फूटती है हाथ से।
हाथ सरिता तुम ये' दोनों , आज मलकर देखना।।

सरिता पन्थी "मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Mahendra Kumar on December 12, 2016 at 9:02pm
अच्छी ग़ज़ल है आदरणीया सरिता जी। हार्दिक बधाई। क्या दूसरे शेर में यह परिवर्तन किया जा सकता है ― "दिल में आ जाए कभी तो उसको हल कर देखना।" देख लीजिएगा। सादर।

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Comment by मिथिलेश वामनकर on December 8, 2016 at 11:44pm

आदरणीया सरिता जी, इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Samar kabeer on December 8, 2016 at 2:36pm
मोहतरमा सरिता पंथी जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
दूसरा शैर कुछ कमज़ोर लगा ।

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