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ख़ुदा की खोज में निकले जो, राम तक पहुँचे (ग़ज़ल)

बह्र : 1212 1122 1212 22

 

प्रगति की होड़ न ऐसे मकाम तक पहुँचे

ज़रा सी बात जहाँ कत्ल-ए-आम तक पहुँचे

 

गया है छूट कहीं कुछ तो मानचित्रों में

चले तो पाक थे लेकिन हराम तक पहुँचे

 

वो जिन का क्लेम था उनको है प्रेम रोग लगा

गले के दर्द से केवल जुकाम तक पहुँचे

 

न इतना वाम था उनमें के जंगलों तक जायँ

नगर से ऊब के भागे तो ग्राम तक पहुँचे

 

जिन्हें था आँखों से ज़्यादा यकीन कानों पर

चले वो भक्त से लेकिन गुलाम तक पहुँचे

 

वतन कबीर का जाने कहाँ गया के जहाँ

ख़ुदा की खोज में निकले जो, राम तक पहुँचे

--------

(मौलिक एवंं अप्रकाशित)

Views: 816

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 21, 2016 at 7:18pm

शुक्रिया आदरणीय आशुतोष मिश्र जी 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 21, 2016 at 7:17pm

शुक्रिया आदरणीय सुरेंद्र नाथ जी

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 16, 2016 at 11:27pm
हार्दिक बधाई धर्मेन्द्र जी
Comment by नाथ सोनांचली on December 15, 2016 at 2:46am
आदरणीय धर्मेन्द्र सिंह जी सादर अभिवादन, इस बेहतरीन गजल के लिए दाद के साथ बधाई निवेदित हैं।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 14, 2016 at 10:18pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि शुक्ला जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 14, 2016 at 10:18pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सोमेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 14, 2016 at 10:17pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय मिथिलेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 14, 2016 at 10:17pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर साहब। आप की बात ठीक है प्रगति उच्चारण के अनुसार 111 हो रहा है इससे लयभंग की स्थिति उत्पन्न हो रही है। ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद

Comment by Ravi Shukla on December 14, 2016 at 1:39pm

आदरणीय घमेंन्‍द्र सिंंह जी बहुत बहुत बधाई इस बढि़या गजल के लिये 

Comment by Mahendra Kumar on December 14, 2016 at 9:42am
जिन्हें था आँखों से ज़्यादा यकीन कानों पर
चले वो भक्त से लेकिन गुलाम तक पहुँचे ...बहुत ख़ूब आदरणीय धर्मेन्द्र जी। इस प्रस्तुति पर आपको हार्दिक बधाई। सादर।

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