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ग़ज़ल- रोज करता खेल शह औ मात का

2122       2122       212

रोज करता खेल शह औ मात का।

रहनुमा पक्का नहीं अब बात का।।

कब पलट कर छेद डाले थालियाँ।

कुछ भरोसा है नहीं इस जात का।।

पत्थरों के शह्र में हम आ गए।

मोल कुछ भी है नहीं जज़्बात का।।

ख्वाहिशें जब रौंदनी ही थी तुम्हे।

क्यूँ दिखाया ख़्वाब महकी रात का।।

इंकलाबी हौसलें क्यों छोड़ दें।

अंत होगा ही कभी ज़ुल्मात का।।

मेंढकों थोड़ा अदब तो सीख लो।

क्या भरोसा बेतुकी बरसात का।।

पीढ़ियों से तख़्त पर काबिज़ तुम्ही।

कौन दोषी आज के हालात का।।

बस बजाना गाल जिनका काम है।

क्या पता उनको पवन औकात का।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by डॉ पवन मिश्र on January 20, 2017 at 5:35pm

आद. डॉ आशुतोष मिश्र जी। इस् उत्साहवर्धन के लिये हृदय से आभार

Comment by डॉ पवन मिश्र on January 20, 2017 at 5:34pm

आद जयनित मेहता जी, बहुत बहुत आभार आपका

Comment by Samar kabeer on January 20, 2017 at 2:58pm
तब मैंने रवि जी की ग़ज़ल पढ़ी थी,इसलिये ये धोका हुआ ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 20, 2017 at 11:48am

आदरणीय डॉ पवन जी ..हर शेर उम्दा ..वर्तमान संदर्भो को उकेरती, राजनीतिक परिद्रश्य की स्थिति से अवगत कराती शानदार शसक्त ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें 

Comment by डॉ पवन मिश्र on January 20, 2017 at 9:14am
आद.सुशील सरना जी। शेर आप तक पहुंचे,कहना सार्थक हो गया। इस हौसला आफजाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया
Comment by डॉ पवन मिश्र on January 20, 2017 at 9:08am
आद.सुरेन्द्र नाथ जी,बहुत बहुत शुक्रिया जनाब
Comment by डॉ पवन मिश्र on January 20, 2017 at 9:06am
आद. मिथलेश वामनकर जी,इस हौसला आफजाई के लिये तहे दिल से शुक्रिया
Comment by डॉ पवन मिश्र on January 20, 2017 at 9:05am
हाँ आद. समर साहब, आद. रवि शुक्ल जी ने इस पर ग़ज़ल कही है।
Comment by जयनित कुमार मेहता on January 20, 2017 at 5:21am
आदरणीय पवन जी, बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने। सभी शेर खूबसूरत हुए हैं। हार्दिक बधाई आपको।
Comment by Sushil Sarna on January 17, 2017 at 6:04pm
रोज करता खेल शह औ मात का।

रहनुमा पक्का नहीं अब बात का।।

कब पलट कर छेद डाले थालियाँ।

कुछ भरोसा है नहीं इस जात का।।

वाह बहुत हक़ीक़ी ग़ज़ल कही है सर अपने। हार्दिक बधाई सर।

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