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अच्छे और बुरे पर्दे (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

स्मार्ट कक्षा में पटल पर अब तीन कानों का सांकेतिक चित्र प्रदर्शित किया गया जिसमें एक खुले हुए कान के दोनों तरफ के कान उँगलियों से ढके हुए थे। अब्राहम लिंकन के 'उनके ही बेटे के हेडमास्टर के नाम पत्र' के अगले पैराग्राफ का हिन्दी अनुवाद समझाते हुए शिक्षक ने छात्रों से कहा- "हेडमास्टर जी, मेरे बेटे को यह भी सिखाइयेगा कि सुने सबकी और जो कुछ भी वह सुने, उसे सत्य की छलनी से छान कर जो अच्छी बात निकले, केवल उसे ही ग्रहण करे!" इतना कहकर शिक्षक ने पटल के चित्र के खुले वाले कान के अंदर की तरफ उँगली से संकेत कर कहा- "भगवान ने कान के अंदर 'प्रश्न चिन्ह' जैसी रचना शायद इसी लिए बनायी है!"

दिलचस्पी से चित्र देखते हुए छात्रों में से एक ने खड़े होकर कहा- "तो क्या इसी लिए भगवान ने मुँह पर होंठ, आँखों पर पलकें और कानों में पर्दे बनाये हैं?"

"हाँ, इसी कारण भी! लेकिन जब हमारी अक़्ल पर ही पर्दे पड़ जाते हैं, तब इन इन्द्रियों, इतिहास और ऐसे महापुरुषों का क्या काम !"

फिर एक पल रुक कर पटल पर चित्र बदलते हुए शिक्षक ने कहा- "अक़्ल पर पर्दे पड़ने के कारण ही तो हमारी नई पीढ़ी अपसंस्कृति अपना रही है!"

उस चित्र में गाँधी जी के तीन बंदरों की हथेलियाँ क्रमशः कान, मुँह और आँखों पर थीं।

[मौलिक व अप्रकाशित]

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 27, 2017 at 8:13pm
इस ब्लोग-पोस्ट पर त्वरित प्रतिक्रिया देने, राय साझा करने व हौसला अफ़जा़ई हेतु सादर हार्दिक धन्यवाद आदरणीय राजेश कुमारी जी व आदरणीय डॉ. आशुतोष मिश्रा जी। कृपया लघुकथा संदर्भ में कमियों पर भी रोशनी डालकर हमें मार्गदर्शन करें
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 27, 2017 at 7:18pm
आदरणीय शेख जी आपकी सोच को सलाम सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 27, 2017 at 5:34pm

चित्रों के माध्यम से बच्चों को संस्कृति का पाठ पढ़ाना उन्हें नसीहत देना अच्छा लगा काश आज की युवा पीढी इन चित्रों के अर्थ को इनके संकेतों को समझ सके इनको समझाने के लिए योग्य शिक्षक का होना भी उतना ही आवश्यक है |बहुत खूब ...बधाई आपको आद० उस्मानी जी 

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