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किसका हक़ ? (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"नहीं, अनवर मियाँ, यह तो नहीं होने दूंगी!" जुबेदा ने पोटली अपनी ओर खींचते हुए कहा- "मेरे अब्बू के ख़ून- पसीने की कमाई का ज़ेवर है यह और मेरी जमा पूँजी!"

"लेकिन मुझे मिले दहेज़ पर मेरा हक़ है! मैं जो चाहूं, करूँगा!" अनवर ने उसको आँखें दिखाते हुए पोटली फिर अपनी तरफ़ खींच ली।

"है, तुम्हारा हक़ है, और मेरा भी! लेकिन मेरी मर्ज़ी के बग़ैर तुम इसे अपनी अम्मीजान के इलाज़ में हरग़िज़ नहीं लगा सकते!"

"तो क्या तुम उन्हें अपनी अम्मी की तरह नहीं मानतीं!"

"मानती हूँ! लेकिन तुम्हारी अम्मी के तो पैर क़ब्र में लटके हुए हैं ही, मुझे क्यों बरबाद करने पर तुले हुए हो!" इस बार जुबेदा ने अपना सारा ग़ुबार निकालते हुए कहा- "अपने माँ-बाप की बातें मानकर ही तुमने अपने वादे के मुताबिक़ न तो बिना दहेज़ लिए शादी की, न ही मुझे कोई नौकरी करने दी और न ही मुझे आगे की पढ़ाई करने दी! तो अब यही बची-खुची पूँजी ही तो मेरा सहारा है न!" यह कह कर वह बुरी तरह रोने लगी।

"जुबेदा पैसा तो दोबारा कमाया जा सकता है, माँ दोबारा नहीं मिल सकती! कुछ भी हो मैं अम्मीजान का इलाज़ जारी रखूंगा, भले ही तुम्हें छोड़ना पड़े! "

"जो चाहें, करियेगा, लेकिन अब मुझे नौकरी करने और आगे पढ़ने से कोई नहीं रोक सकता, देख लिया तुम्हारा ईमान और तुम्हारी मर्दानगी!"

"मर्दानगी!"

"हाँ मर्दानगी! बाप की छाती पर बैठकर शादीशुदा ज़िन्दगी जीने वाले शौहर के लिए और क्या कहूँ!"

यह सुनकर अनवर ने वह पोटली जुबेदा की तरफ़ फैंक दी।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 29, 2017 at 6:32am
मेरी इस रचना पटल पर समय देकर अनुमोदन व हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय डॉ. आशुतोष मिश्रा जी, मिथिलेश वामनकर जी व आदरणीय BAIJNATH SHARMA'MINTU'जी,
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on January 28, 2017 at 4:41pm

बहुत सुन्दर लघुकथा ....बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 25, 2017 at 1:27pm

आदरणीय शेख जी इस शानदार लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई ..आपकी लघु कथाएँ पढ़ते पढ़ते ही इस बिधा में मेरी दिलचस्पी बढ़ी है ..इस रचना प् हार्दिक बधायी के साथ सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 25, 2017 at 12:33am

आदरणीय उस्मानी जी बढ़िया लघुकथा लिखी है. काश ज़ुबैदा ने इतनी हिम्मत शादी के पहले दिखाई होती. लेकिन वही कुछ मजबूरियां. एक सफल लघुकथा के लिए बहुत बहुत बधाई. सादर 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 24, 2017 at 6:30pm
मेरी इस ब्लोग पोस्ट पर समय देने व स्नेहिल हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब समर कबीर साहब और जनाब सुरेन्द्र कुमार 'कुशक्षत्रप' साहब।
Comment by नाथ सोनांचली on January 23, 2017 at 8:37am
आद0 शहजाद उस्मानी साहब सादर अभिवादन, बहुत ही गूढ़ सन्दर्भ में लिखी गयी लघुकथा कई माने में हम सबके इर्द गिर्द घूमती हुयी ही है, बेहतरीन लघुकथा के लिए बधाई ग्रहण करें।
Comment by Samar kabeer on January 22, 2017 at 10:31pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,हमेशा की तरह बहतरीन लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 22, 2017 at 9:27pm
मेरी इस ब्लोग पोस्ट पर भी आपकी त्वरित प्रतिक्रिया व हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब।
Comment by Mohammed Arif on January 22, 2017 at 8:46pm
आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानीजी, आदाब ! नारी स्वाभिमान को जाग्रत करती लघुकथा के लिए ढेरों मुबारकबाद कुबूल करें ।

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