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ग़ज़ल - कह दिये , हर वास्ता जाता रहा ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122       212  

दिल से जब नाम-ए ख़ुदा जाता रहा

दरमियानी मो’जिजा जाता रहा

 

ख़ुद पे आयीं मुश्किलें तो, शेख जी

क्यूँ भला हर फल्सफ़ा जाता रहा

 

जो इधर थे हो गये जब से उधर

कह दिये , हर वास्ता जाता रहा

 

अब ख़बर में वाक़िया कुछ और है

था जो कल का हादसा जाता रहा

 

गर हुजूम –ए शहर का है साथ , तो  

जो किया तुमने बुरा जाता रहा

 

आँखों में पट्टी, तराजू हाथ में

जब दिखे, तो हौसला जाता रहा

 

कह ज़दीद, अब का ज़माना और है

वक़्त कल का इश्क़िया, जाता रहा

*********************************
मौलिक एवँ अप्रकाशित

मो' जिजा = चमत्कार , फल्सफा = दर्शन ( शास्त्र ) , ज़दीद = आधुनिक

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 16, 2017 at 5:33pm

आ. काली पद भाई , आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 16, 2017 at 5:32pm

आदरणीय मो. आरिफ भाई , आपका  ह्र्दय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 16, 2017 at 5:32pm

आदरणीय समर भाई , सराहना के लिये आपका आभार ।

Comment by Kalipad Prasad Mandal on January 29, 2017 at 4:57pm

आ गिरिराज जी बहुत उम्दा ग़ज़ल के लिए बधाई | मो'जिज़  का अर्थ शब्द कोष में "आश्चर्य में डालने वाला " दिया है लेकिन आदरणीय समर कबीर साहिब ने जो समझाया उससे अर्थ और स्पष्ट होगया | अब इसको कभी भूलेंगे नहीं |सादर 

Comment by Mohammed Arif on January 27, 2017 at 8:31pm
आदरणीय गिरिराजजी, एकदम उम्दा ग़ज़ल , बधाई क़ुबूल करें ।
Comment by Samar kabeer on January 26, 2017 at 9:03pm
अब आपका मतला बहतरीन हो गया है,मेरे कहे को मान देने के लिये बहुत शुक्रिया ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 26, 2017 at 7:51pm

आदरणीय सुरेन्द्र भाई , आपने सही कहा , एक शन्द को समझाने के लिये आ. समर भाई जी ने बहुत समय दिया । अब मंच को चाहिये कि इस चर्चा का लाभ उठाये ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 26, 2017 at 7:49pm

आदरणीय नवीन भाई , गज़ल पर उपस्थिति और सराहना के लिये हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 26, 2017 at 7:48pm

क्या बात है , आदरणीय समर भाई , आपने मोजिज़ा के अर्थ को समझाने के लिये अपना इतना कीमती समय दिया , ज़रूर मंच इस चर्चा से लाभांवित होगा । आपका हार्दिक आभार ।

मतले के सानी को बदलने के बाद  अब मतला को कृपया ऐसे पढ़ने की कृपा करें --

दिल से जब नाम - ए - ख़ुदा जाता रहा

'' हर करिश्मा बीच का , जाता रहा ''


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 26, 2017 at 7:42pm

आदरणीय बृजेश भाई , ग़ज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।

कृपया ध्यान दे...

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