For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

लहराता खिलौना (लघुकथा)

देश के संविधान दिवस का उत्सव समाप्त कर एक नेता ने अपने घर के अंदर कदम रखा ही था कि उसके सात-आठ वर्षीय बेटे ने खिलौने वाली बन्दूक उस पर तान दी और कहा "डैडी, मुझे कुछ पूछना है।"

 

नेता अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला, "पूछो बेटे।"

 

"ये रिपब्लिक-डे क्या होता है?" बेटे ने प्रश्न दागा।

 

सुनते ही संविधान दिवस के उत्सव में कुछ अवांछित लोगों द्वारा लगाये गए नारों के दर्द ने नेता के होंठों की मुस्कराहट को भेद दिया और नेता ने गहरी सांस भरते हुए कहा,

"हमें पब्लिक के पास बार-बार जाना चाहिये, यह हमें याद दिलाने का दिन होता है रि-पब्लिक डे..."

 

"ओके डैडी और उसमें झंडे का क्या काम होता है?" बेटे ने बन्दूक तानी हुई ही थी।

 

नेता ने उत्तर दिया, "जैसे आपने यह गन उठा रखी है, वैसे ही हमें झंडा उठाना पड़ता है।"

 

"डैडी, मुझे भी झंडा खरीद कर दो... नहीं तो मैं आपको गोली से मार दूंगा" बेटे का स्वर पहले की अपेक्षा अधिक तीक्ष्ण था।

 

नेता चौंका और बेटे को डाँटते हुए कहा, "ये कौन सिखाता है आपको? बन्दूक अच्छी नहीं लगती मेरे बेटे के हाथ में।"

और उसने वहीँ खड़े ड्राईवर को कुछ लाने का इशारा कर अपने बेटे के हाथ से बन्दूक छीनते हुए आगे कहा,

“अब आप गन से नहीं खेलोगे, झंडा मंगवाया है, उससे खेलो।”

 

कहते हुए नेता बिना पीछे देखे सधे हुए क़दमों से अंदर चला गया।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 384

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 2, 2017 at 10:03am

बहुत-बहुत आभार आदरणीया सीमा मिश्रा जी, आदरणीया राजेश कुमार जी, आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी साहब, आदरणीया नीता कसार जी, आप सभी को यह प्रयास ठीक लगा और लघुकथा के मर्म तक पहुँच कर अपनी टिप्पणी द्वारा आप सभी ने मेरा उत्साहवर्धन किया| सादर,

Comment by Nita Kasar on January 29, 2017 at 7:48pm
बच्चे घर से ही सीखते है अपनी आंखो के सामने कुसंसकार पनपते देख नेता के पाँव तले जमीन खिसकना ही थी आज की राजनीति पर कटु व्यंग्य करती कथा के लिये बधाई आद० चंद्रेश छतलानी जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 29, 2017 at 10:25am
आदरणीय डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी जी लघुकथाओं में पंचपंक्ति/पंचपंक्तियों के अलावा सम्पूर्ण रचना के संवादों/प्रतीकों में भी मुझे बेहतरीन सन्देश सम्प्रेषण होता दिखता है कथ्य उभारते हुए। ऐसा ही इस उत्कृष्ट लघुकथा में भी है--
1- // "ये रिपब्लिक-डे क्या होता है?" //..देश के भविष्य (बच्चे) की अज्ञानता !!!!
2- // यह हमें याद दिलाने का दिन होता है रि-पब्लिक डे...//
नेताओं की हक़ीक़त/बोझिल गतिविधियाँ

3- // हमें झंडा उठाना पड़ता है।"//.. स्वीकारोक्ति व सच्चाई
4- // झंडा मंगवाया है, उससे खेलो// ..तंज/व्यंग्य/हक़ीक़त

बेहतरीन सृजन के लिए सादर हार्दिक बधाई आपको आदरणीय डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 27, 2017 at 5:38pm

“अब आप गन से नहीं खेलोगे, झंडा मंगवाया है, उससे खेलो।”----झंडे के साथ खेल ही तो रहे हैं नेता लोग ..तो बच्चों को यही तो कहेंगे की झंडे से खेलो ...वाह्ह्ह्हह जबरदस्त पंच लाइन आज की नेतागिरी ,मौकापरस्त राजनीति पर प्रहार करती हुई .बहुत बहुत बधाई इस सामयिक लघु कथा के लिए आद० चंद्रेश कुमार छत्लानी जी .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post चाँद को जब बदसूरत करने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
""आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक…"
31 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ढूँढा सिर्फ निवाला उसने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"आठवें शेर में पर का अर्थ दूसरों से है । "
33 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ढूँढा सिर्फ निवाला उसने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद। आपने गजल को…"
35 minutes ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post चाँद को जब बदसूरत करने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, पर्यावरण पर चिंता के भाव से उम्दा ग़ज़ल कही है आपने, दाद के…"
3 hours ago
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय समर कबीर सर् सादर नमस्कार।सर् ग़ज़ल तक आने तथा मार्गदर्शन करने के लिए आपकी आभारी हूँ।सर्…"
4 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on सालिक गणवीर's blog post एक ही जगह बस पड़ा हूँ मैं......( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने, उस्ताद मुहतरम की इस्लाह पर अमल के बाद ग़ज़ल…"
4 hours ago
Rachna Bhatia commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' जी नमस्कार।ग़ज़ल तक आने तथा हौसला बढ़ाने के लिए आपकी आभारी हूँ…"
4 hours ago
Aazi Tamaam commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल (1222 1222 122)
"धन्यवाद आ० समर कबीर गुरु जी मार्गदर्शन करते रहें"
4 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Manoj kumar Ahsaas's blog post अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास
"जनाब मनोज 'अह्सास' जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ, मिसरा- उठती नहीं…"
7 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rachna Bhatia's blog post ग़ज़ल- रूह के पार ले जाती रही
"मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, रूहानी अंदाज़ में अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ, उस्ताद…"
8 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on amita tiwari's blog post सर्दीली सांझ ऐसे आई मेरे गाँव
"मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब, सुंदर रचना हुई है, हृदय तल से बधाईयाँ। सादर। "
8 hours ago
Samar kabeer commented on Aazi Tamaam's blog post ग़ज़ल (1222 1222 122)
"जनाब आज़ी तमाम जी आदाब, आपकी ग़ज़ल अभी समय चाहती है, अध्यन करे,इस प्रस्तुति पर बधाई आपको ।"
9 hours ago

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service