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सिमटी रही

दो रोटियों के बीच
पूरी जिंदगी

ढूँढते रहे
जिंदगी भर सार
पर निस्सार

किसका बस
आज है कल नहीं
जिंदगी का क्या

आदि से अंत
बने अनंत, दूर
क्षितिज पर
 
 

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 485

Comment

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Comment by Neelam Upadhyaya on February 6, 2017 at 11:48am

आप सभी गुणी जनों को सादर नमस्कार. हाइकू पर आप सभी की टिप्पणियों के लिए आभार व्यक्त करती हू.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 3, 2017 at 10:21am

आदरणीया नीलम जी अच्छी लगी आपकी चारों हाइकु रचना , हार्दिक बधाई आपको ।

Comment by Samar kabeer on February 1, 2017 at 9:21pm
मोहतरमा नीलम उपाध्याय जी आदाब,अच्छे लगे हाइकू,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Mohammed Arif on February 1, 2017 at 5:01pm
आदरणीया नीलमजी, ज़िंदगी को परिभाषित करते हाइकु के लिए बधाई प्रेषित करता हूँ ।
Comment by narendrasinh chauhan on February 1, 2017 at 10:23am

सुन्दर रचनाए 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 31, 2017 at 10:50pm
बेहतरीन गहरे भाव पूर्ण रचनाओं के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीय नीलम उपाध्याय जी।

कृपया ध्यान दे...

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"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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