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खुशियों की चाबी - लघुकथा –

खुशियों की चाबी - लघुकथा –

कालूराम फ़ुट्पाथ पर जूते मरम्मत करता था। उसके पास में ही रहमान तालों की चाबियाँ बनाता था।

"कालू भैया, कई दिन से देख रहा हूं कि आप कुछ दुखी हो। आजकल घर से खाना भी नहीं लाते। खाली चाय और डबल रोटी से काम चलाते हो"।

"हाँ रहमान भाई, तुमने सही कहा। मेरा घर बिखर रहा है।जब से बेटे की शादी हुई है, घर का माहौल बिगड़ गया है"।

"ऐसी क्या वज़ह हुई है"।

"बेटे की बहू अलग होना चाहती है"।

"तो हो जाने दो अलग"।

"वह चाहती है कि हम लोग इस घर से अलग हो जांय"।

"मतलब आप और भाभी इस घर से चले जाओ"।

"हाँ, यही उसकी इच्छा है।कहती है यह घर मेरे पति का है"।

"और तुम्हारा बेटा क्या कहता है"।

"बेटा इस बात पर राज़ी नहीं हो रहा है, इसीलिये झगड़ा होता है"।

"समस्या गंभीर है। वह लड़की अपने घर में यही सब देख सुन कर बड़ी हुई है।उसे सिर्फ़ अपना सुख दिखता है।उस लड़की को सही संस्कार नहीं मिले"।

"यार रहमान भाई, तुम दिन भर में कितनी चाभियाँ बनाते हो।क्या कोई ऐसी चाबी नहीं बना सकते जो मेरे घर की खुशियों का ताला खोल सके"।

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on February 25, 2017 at 5:50pm

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला जी।

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 25, 2017 at 1:43pm

वाह ! ऐसी चाबी जो घर के खुशियों का ताला खोल सके, बाजार में नहीं स्वयम को घर में ही सभी के सामजस्य से बनाती होती है | सुंदर लघु कथा श्री तीज वीर सिंह जी 

Comment by TEJ VEER SINGH on February 25, 2017 at 11:37am

हार्दिक आभार आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब जी।

Comment by Mohammed Arif on February 25, 2017 at 9:24am
आदरमणीय तेजवीर सिंह जी आदाब,बहुत बेहतरीन लघुकथा । सचमुच जो संस्कार हमारे समाज में पनप रहें हैं वो हमारी खुशियाँ छीन रहें हैं । आप हम परेशान हो रहे हैं । बधाई !बधाई!!
Comment by TEJ VEER SINGH on February 24, 2017 at 5:02pm

हार्दिक आभार आदरणीय प्रतिभा पांडे जी।

Comment by pratibha pande on February 24, 2017 at 1:47pm
सच मे कहाँ मिलेगी ये चाबी किसी को नही पता एक अच्छी कथा के लिये आपको बधाई आदरणीय

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