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ग़ज़ल..गले में झूलते बाँहों के नर्म हार की बात।

गले में झूलते बाँहों के नर्म हार की बात।
ये बात है मेरे मौला हसीं हिसार की बात।

रखोगे आग पे माखन तो वो पिघल ही जायेगा।
भला टली है कभी , है ये होनहार की बात।

ये इंकलाब की बातें है जोश वालों की।
कहीं पढ़ी थी जो मैंने वो बुर्दबार की बात।

कहूँ किसी से भला क्यों , छुपा के रखे हैं।
उन्हीं की आँखों के किस्से उन्ही के प्यार की बात।

बड़ी कठिन है ये शेरो-सुखन नवाजी जनाब।
बेइख़्तियार से हालात , क़ि बारदार की बात।

ख़याल ही जब हिन्दोस्ताँ का हो न तो फिर।
फरेब हैं सब , धोखा है बागदार की बात।
गंगा धर शर्मा हिन्दुस्तान'

मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 26, 2017 at 10:27pm

बहुत खूब सुन्दर ग़ज़ल बधाई

Comment by Sushil Sarna on February 26, 2017 at 12:11pm

आदरणीय गंगाधर जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Mohammed Arif on February 26, 2017 at 9:23am
आदरणीय गंगाधर जी आदाब, बहुत बढ़िया ग़ज़ल । देशभक्ति का भी रंग आ गया । शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

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